Air India-Indigo Plane Collision: टैक्‍सी-वे पर दो प्‍लेन्‍स के बीच कितनी होती है दूरी, क्‍या हैं टैक्‍सीइंग से जुड़े एविएशन रूल्‍स? जानें हर सवाल का जवाब

2 hours ago

Air India-Indigo Plane Collision: मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर टैक्सी करते समय इंडिगो और एयर इंडिया के दो प्‍लेन आपस में टकरा गए. दोनों प्‍लेन्‍स के बीच हुई इस टक्‍कर ने एयर साइट पर एयरक्राफ्ट ऑपरेशन और सेफ्टी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. साथ ही, यह भी साफ कर दिया है कि खतरा सिर्फ आसमान में उड़ान के दौरान नहीं, बल्कि जमीन पर भी बराबर का है.

एविएशन एक्सपर्ट्स की मानें तो ग्राउंड मूवमेंट भी आसमान जितना ही क्रिटिकल फेज होता है. यह फेज पूरी फ्लाइट के सबसे ज्यादा कोऑर्डिनेशन वाले फेजेज में से एक होता है. इस फेज में पायलट, एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी), ग्राउंड कंट्रोल, एयरपोर्ट ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर और ग्राउंड स्टाफ अलग-अलग फेजेज में टैक्‍सीइंग ऑपरेशन से जुड़ते हैं और एयरक्राफ्ट की सुरक्षित मूवमेंट सुनिश्चित कर पार्किंग वे तक पहुंचाते हैं.

एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, जब तक एयरक्राफ्ट हवा में होता है, तब तक उसका ऑपरेशन एटीसी के हाथों में होता है. जैसे ही एयरक्राफ्ट के टायर रनवे को छूते हैं, यह ऑपरेशन एटीसी से एयरपोर्ट ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर (एओसीसी) और ग्राउंड कंट्रोल के पास शिफ्ट हो जाता है. इसके बाद मार्शलर (ग्राउंड स्टाफ) प्‍लेन को पार्किंग-बे या बोर्डिंग गेट पर पार्किंग कराने में मदद करता है.

क्‍या होती है टैक्सीइंग और कितनी होती है प्‍लेन की स्‍पीड?

जब कोई एयरक्राफ्ट लैंड करता है, तो वह रनवे पर रुकता नहीं बल्कि जल्द से जल्द रनवे खाली करता है ताकि अगली फ्लाइट प्रभावित न हो. रनवे छोड़ने के बाद एयरक्राफ्ट टैक्सीवे पर आता है. यहां से ग्राउंड कंट्रोल, जो एटीसी का ही हिस्सा होता है, पायलट को बताता है कि उसे किस रास्ते से पार्किंग बे या गेट तक जाना है. ठीक इसी तरह टेकऑफ से पहले एयरक्राफ्ट गेट से पुशबैक होकर टैक्सीवे से रनवे की ओर जाता है.

एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में पायलट अपनी मर्जी से कोई कदम नहीं चुनता. हर मोड़, हर रुकने की जगह एटीसी और एओसीसी के निर्देश पर तय होती है. उन्‍होंने बताया कि टैक्‍सीइंग के दौरान, प्‍लेन अपने इंजन की पावर से चलता है और इसकी स्‍पीड आमतौर पर इसकी स्‍पीड 10 किमी प्रतिघंटा से 40 किमी प्रति घंटा के बीच होती है.

टैक्‍सीइंग के दौरान दो एयरक्राफ्ट के बीच होती है कितनी दूरी और…

टैक्‍सीइंग के दौरान दो एयरक्राफ्ट्स के बीच की दूरी एयरक्राफ्ट के साइज, विंगस्पैन, टैक्सीवे की चौड़ाई और एयरपोर्ट डिजाइन स्टैंडर्ड से तय होती है. उदाहरण के लिए A320 जैसे एयरक्राफ्ट का विंगस्पैन लगभग 34 मीटर होता है, जबकि बड़े वाइड बॉडी एयरक्राफ्ट्स का विंगस्पैन 60 मीटर से भी ज्यादा हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय सिविल एविएशन संगठन (ICAO) के एरोड्रोम डिजाइन मानकों के अनुसार टैक्सीवे और आसपास के स्ट्रक्चर इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि समान श्रेणी के दो एयरक्राफ्ट्स के बीच सुरक्षित विंगटिप क्लियरेंस बना रहे. आम तौर पर डिजाइन स्तर पर कम से कम 7.5 मीटर या उससे अधिक का साइड क्लियरेंस सुनिश्चित किया जाता है, लेकिन यह तभी संभव है जब एयरक्राफ्ट बिल्कुल सेंटरलाइन पर चले. टैक्सीवे पर बनी सेंटरलाइन पायलट के लिए सबसे अहम विजुअल गाइड होती है. पायलट को निर्देश होता है कि वह इस लाइन को फॉलो करे, क्योंकि पूरी क्लियरेंस इसी पर आधारित होती है. अगर एयरक्राफ्ट सेंटरलाइन से थोड़ा भी हटता है, तो विंगटिप क्लियरेंस कम हो सकती है. जिसका नतीजा मुंबई एयरपोर्ट पर हुई घटना के तौर पर सामने आ जाते हैं. मुश्किल यह है कि कॉकपिट से पायलट को अपने विंग का सिरा सीधे दिखाई नहीं देता. उसे अपने अनुभव, बाहरी विजुअल संकेतों और अनुमान पर निर्भर रहना पड़ता है. यही वजह है कि टैक्सीइंग के दौरान स्पीड बहुत कम रखी जाती है, ताकि किसी भी संदेह की स्थिति में एयरक्राफ्ट तुरंत रोका जा सके. जिस तरह, एयर ट्रैफिक कंट्रोल की भूमिका आसमान में महत्वपूर्ण होती है, उसी तरह जमीन पर ग्राउंड कंट्रोलर और एओसीसी का रोल बेहद अहम होता है. ग्राउंड कंट्रोलर और एओसीसी हर एयरक्राफ्ट की पोजिशन मॉनिटर करता है और सुनिश्चित करता है कि दो एयरक्राफ्ट्स की मूवमेंट एक-दूसरे से टकराव की स्थिति में न आए.

आइए अब जानिए टैक्‍सीइंग से जुड़े एविएशन रूल्‍स से जुड़े सवालों के जवाब

दो एयरक्राफ्ट्स के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए?
दो एयरक्राफ्ट्स के बीच दूरी का कोई एक फिक्स मीटर रूल नहीं होता है. यह दूरी कई चीज़ों पर डिपेंड करती है, जिसमें एयरक्राफ्ट टाइप, टैक्सीवे चौड़ाई, एयरपोर्ट का लेआउट और आईसीएओ स्टैंडर्ड शामिल हैं.उदाहरण के लिए ए320 जैसे नैरो बॉडी जेट का विंगस्पैन लगभग 34 मीटर होता है. इस डिजाइन के लिए बने रूल्‍स के अनुसार कम से कम 7.5 मीटर विंगटिप क्लियरेंस होना चाहिए.

टैक्सी करते समय कंट्रोल किसके पास होता है?
टैक्सी के दौरान कंट्रोल एक टीमवर्क होता है.ग्राउंड कंट्रोलर रेडियो पर पायलट को बताता है कि कौन सा टैक्सीवे लेना है, कहां रुकना है और किस ट्रैफिक को पहले जाने देना है.पायलट की जिम्मेदारी है कि वह सेंटरलाइन फॉलो करे, स्पीड कंट्रोल में रहे और विंगटिप क्लियरेंस पर नजर बनाए रखे. अगर कोई डाउट हो तो एयरक्राफ्ट स्टॉप करना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है.पार्किंग एरिया में मार्शलर या ग्राउंड स्टाफ हैंड सिग्नल से गाइड करते हैं.

विंगटिप कॉलिजन किस परिस्थितियों में हो सकता है?
विंगटिप कॉलिजन ज्‍यादातर जमीन पर लो स्पीड मूवमेंट के दौरान होता है. टैक्सीवे जंक्शन पर टर्न, दूसरे एयरक्राफ्ट की पोजि‍शन जजमेंट में गलती, लो विजि‍बिलिटी और लंबे विंग वाले जेट की पोजिशनिंग की वजह से विंगटिप कॉलिजन हो सकता है. कॉकपिट से पायलट को विंगटिप सीधे नहीं दिखते, इसलिए वह ग्राउंड मार्किंग और अनुभव पर निर्भर रहता है. टर्न लेते समय विंग पीछे की तरफ स्विंग करता है, जिसे विंग स्विंग इफेक्ट कहा जाता है. इसी दारौन हुई मिसकैल्कुलेशन से विंगटिप कॉलिजन हो सकता है.

क्या टेक्नोलॉजी की मदद से प्‍लेन को सुरक्षि‍त पार्किंग-बे तक नहीं पहुंचाया जा सकता है?
बड़े एयरपोर्ट पर कई सिस्टम काम करते हैं. सरफेस मूवमेंट रडार (SMR) कंट्रोलर को दिखाता है कौन सा एयरक्राफ्ट कहां है. ग्राउंड मूवमेंट गाइडेंस सिस्टम (GMGS) सही रूटिंग में मदद करता है. टैक्सीवे लाइटिंग और साइनेज पायलट को रास्ता दिखाते हैं. कम विजि‍बिलिटी में फॉलो-मी व्हीकल आगे चलकर रास्ता दिखाते हैं. लेकिन फाइनल जिम्मेदारी पायलट और एओसीसी कोऑर्डिनेशन की ही रहती है.

अगर विंगटिप टच हो जाए तो क्या होता है?
अगर विंगटिप कॉन्टैक्ट हो जाए तो एयरक्राफ्ट तुरंत रोका जाता है और एटीसी को रिपोर्ट किया जाता है. जरूरत पड़े तो पैसेंजर डीबोर्ड कराए जाते हैं. इंजीनियर स्ट्रक्चरल इंस्पेक्शन करते हैं कि सिर्फ पेंट स्क्रैच है या अंदरूनी डैमेज भी है .मामला डीजीसीए रिपोर्ट तक जाता है. छोटा सा डैमेज भी एयरक्राफ्ट को तब तक के लिए एओजी (एयरक्राफ्ट ऑन ग्राउंड) बना सकता है जब तक डीजीसीए से क्लियरेंस न मिल जाए.

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