12 लाख के बजट में 5 करोड़ की BMW? आखिर लोकपाल ने क्यों रद्द किया टेंडर

1 hour ago

नई दिल्ली: लोकपाल का नाम आते ही आम लोगों के मन में ईमानदारी, सादगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती की तस्वीर उभरती है. लेकिन जब यही संस्था सात महंगी BMW कारें खरीदने की तैयारी करती दिखी, तो सवाल उठना लाज़मी था. महज़ 12 लाख रुपए के पुराने वाहन बजट के मुकाबले करीब 5 करोड़ रुपए की लग्जरी कारों का प्रस्ताव सामने आते ही बहस शुरू हो गई.

News18 की रिपोर्ट के बाद यह मामला सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनता, पूर्व अफसरों और नीति से जुड़े लोगों के बीच चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया. बढ़ते दबाव और आलोचना के बीच लोकपाल ने आखिरकार यह टेंडर रद्द कर दिया. लेकिन सवाल अब भी कायम है कि क्या लोकपाल को यह फैसला पहले ही नहीं सोचना चाहिए था?

क्या था BMW कारों का प्रस्ताव?

अक्टूबर 2025 में लोकपाल ऑफ इंडिया ने सात BMW 3 Series 330 Li (Long Wheelbase) कारों की खरीद के लिए आधिकारिक टेंडर जारी किया था. ये कारें लोकपाल के सात सदस्यों के उपयोग के लिए प्रस्तावित थीं. हर कार की कीमत करीब 70 लाख रुपए आंकी गई. इससे कुल खर्च लगभग 5 करोड़ रुपए तक पहुंच रहा था. टेंडर में साफ तौर पर सफेद रंग, स्पोर्ट (लॉन्ग व्हीलबेस) मॉडल और तय समय में डिलीवरी जैसी शर्तें रखी गई थीं.

12 लाख बनाम 5 करोड़: विरोध की असली वजह

विवाद की जड़ सिर्फ BMW ब्रांड नहीं था, बल्कि बजट और प्राथमिकताओं का भारी अंतर था. लोकपाल के बजट दस्तावेजों से जो तस्वीर सामने आई, उसने सवाल और गहरे कर दिए.

आंकड़ों पर एक नजर:

2023-24 में मोटर व्हीकल के लिए बजट: ₹12 लाख 2023-24 में वास्तविक खर्च: शून्य 2025-26 का कुल बजट: ₹44.32 करोड़ प्रस्तावित BMW खरीद: करीब ₹5 करोड़

आलोचकों का कहना था कि अगर यह खरीद होती, तो लोकपाल अपने सालाना बजट का 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिर्फ गाड़ियों पर खर्च कर देता.

क्यों बढ़ा जनाक्रोश?

लोकपाल को भ्रष्टाचार के खिलाफ बनी संस्था माना जाता है. इसलिए उससे अपेक्षा भी अलग होती है. आम धारणा यही रही कि ऐसी संस्था को सादगी और ज़िम्मेदारी का उदाहरण पेश करना चाहिए, न कि लग्ज़री का. पूर्व IPS अधिकारी और जन लोकपाल आंदोलन की समर्थक रहीं किरण बेदी ने इस फैसले को ‘पूरी तरह टालने योग्य’ बताया. उन्होंने कहा कि लोकपाल किसी भी तरह की शानो-शौकत के लिए नहीं बनाया गया है.

स्वदेशी बनाम विदेशी कारों की बहस

किरण बेदी ने इस मुद्दे को स्वदेशी से जोड़ते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी पर जोर दे रहे हैं, तब लोकपाल का विदेशी कारों की ओर रुख करना जनभावनाओं के खिलाफ है. उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी यह सवाल उठने लगा कि क्या भारतीय संस्थानों को भारतीय निर्मित वाहनों को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए?

कैसे और कब लिया गया यू-टर्न?

बढ़ती आलोचना के बीच लोकपाल ने 17 दिसंबर 2025 को आधिकारिक आदेश जारी कर टेंडर रद्द करने की जानकारी दी. आदेश में कहा गया कि यह फैसला ‘प्रशासनिक कारणों/मुद्दों’ की वजह से लिया गया है. यह निर्णय लोकपाल की फुल बेंच ने 27 नवंबर 2025 को लिया था. हालांकि आदेश में सार्वजनिक दबाव या आलोचना का सीधा ज़िक्र नहीं है, लेकिन समय और हालात देखकर यह साफ है कि विवाद ने इस फैसले में बड़ी भूमिका निभाई.

लोकपाल की भूमिका और उससे जुड़ी अपेक्षाएं

लोकपाल ऑफ इंडिया की स्थापना लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत हुई थी. यह संस्था सार्वजनिक पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करती है. लोकपाल के चेयरपर्सन को भारत के मुख्य न्यायाधीश के बराबर वेतन और सुविधाएं मिलती हैं, जबकि सदस्यों को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान दर्जा प्राप्त है. यही वजह है कि लोकपाल के हर फैसले को सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक कसौटी पर भी परखा जाता है.

क्या यह सिर्फ टेंडर रद्द होने की कहानी है?

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा संदेश दिया है. सरकारी संस्थानों के फैसले अब सिर्फ फाइलों में नहीं, बल्कि जनता की नजर में भी जांचे जाते हैं. लोकपाल द्वारा BMW टेंडर रद्द करना यह दिखाता है कि सार्वजनिक दबाव और जवाबदेही अब औपचारिक शब्द नहीं रहे. सवाल यह नहीं है कि कारें क्यों चाहिए थीं, बल्कि यह है कि क्या लोकपाल जैसी संस्था को ऐसे फैसले लेते समय पहले ही जनता की भावना नहीं समझनी चाहिए थी?

अगर आप चाहें, तो अगले स्टेप में मैं इस मुद्दे पर तुलनात्मक एनालिसिस, अन्य संवैधानिक संस्थाओं के खर्च का उदाहरण, या ‘सरकारी सादगी बनाम VIP कल्चर’ पर एक्सप्लेनर भी तैयार कर सकता हूं.

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