नई दिल्ली. आज के दौर में जब राजनीतिक ध्रुवीकरण अक्सर सार्वजनिक चर्चाओं पर हावी रहता है, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म पुरस्कार और भारत रत्न ने एक अलग ही मिसाल पेश की है. 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से पुरस्कारों के चयन में एक स्पष्ट बदलाव आया है. यह बदलाव है पार्टी लाइन और विचारधारा की सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय योगदान को सम्मानित करना. इस साल की पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मोदी सरकार में सम्मान का आधार ‘वोट बैंक’ या ‘पार्टी का झंडा’ नहीं, बल्कि देश सेवा है. इसमें वामपंथी दिग्गज नेता वीएस अच्युतानंदन हैं तो झारखंड के ‘गुरुजी’ के नाम से मशहूर शिबू सोरेन भी. यह ‘क्रॉस-पार्टी रिकग्निशन’ यानी दलगत राजनीति से परे सम्मान की झलक साफ दिखाती हैं;
वी.एस. अच्युतानंदन (मरणोपरांत): केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और वामपंथी आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक, ‘वीएस’ को देश का दूसरा सर्वोच्च सम्मान ‘पद्म विभूषण’ दिया गया है. वे जीवन भर भाजपा और संघ की विचारधारा के खिलाफ खड़े रहे, लेकिन राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को सरकार ने नमन किया.
शिबू सोरेन: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के सुप्रीमो शिबू सोरेन को ‘पद्म भूषण’ से नवाजा गया है. भले ही राजनीति के मैदान में उनकी पार्टी भाजपा की विरोधी हो, लेकिन आदिवासी समाज के लिए उनके संघर्ष को सम्मान दिया गया.
संतुलन की मिसाल: एक तरफ वामपंथी नेता वी. नटेसन को पद्म भूषण मिला, तो दूसरी तरफ भाजपा के दिवंगत नेता वी.के. मल्होत्रा और असम के वरिष्ठ नेता कबींद्र पुरकायस्थ (पद्म श्री) को भी उनके लंबे सार्वजनिक जीवन के लिए सम्मानित किया गया.
जब ‘विरोधी’ बने ‘पद्म वीर’
यह केवल इस साल की बात नहीं है. पिछले एक दशक का रिकॉर्ड बताता है कि मोदी सरकार ने उन विपक्षी नेताओं, क्षेत्रीय क्षत्रपों और वैचारिक विरोधियों को भी खुले दिल से सम्मानित किया है, जो राजनीति में उनके खिलाफ रहे. यह उस दौर के बिल्कुल विपरीत है, जब कांग्रेस नीत सरकारों के दौरान शायद ही कभी किसी भाजपा नेता को राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा जाता था.
मोदी सरकार ने पिछले वर्षों में इन दिग्गजों को सम्मानित कर नई लकीर खींची है.
मुलायम सिंह यादव (2023): समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पीएम मोदी के कड़े आलोचक रहे ‘नेताजी’ को मरणोपरांत ‘पद्म विभूषण’ दिया गया.
तरुण गोगोई (2021): असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता तरुण गोगोई को मरणोपरांत ‘पद्म भूषण’ मिला.
गुलाम नबी आजाद (2022): कांग्रेस के वरिष्ठ नेता (उस समय) को ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया.
शरद पवार (2017): एनसीपी प्रमुख शरद पवार को ‘पद्म विभूषण’ दिया गया.
पी.ए. संगमा (2017): पूर्व लोकसभा अध्यक्ष को मरणोपरांत सम्मान मिला.
इसके अलावा नागालैंड के पूर्व सीएम एस.सी. जमीर, कांग्रेस नेता तोखेहो सेमा, पीडीपी नेता मुजफ्फर बेग और अकाली दल के तरलोचन सिंह जैसे नाम इस समावेशी सूची का हिस्सा रहे हैं. यहां तक कि पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य को भी पद्म भूषण देने की घोषणा की गई थी (भले ही उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया).
भारत रत्न
सिर्फ पद्म पुरस्कार ही नहीं, देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ में भी मोदी सरकार ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर फैसले लिए हैं. 2014 से अब तक 10 महान हस्तियों को भारत रत्न दिया गया है, जो एक व्यापक राष्ट्रीय सहमति को दर्शाता है.
2019: कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया गया. उनके साथ समाज सुधारक नानाजी देशमुख और सांस्कृतिक आइकन भूपेन हजारिका को भी सम्मानित किया गया.
2024 का ऐतिहासिक वर्ष: एक ही साल में 5 भारत रत्न दिए गए. इनमें समाजवादी आइकन कर्पूरी ठाकुर, पूर्व पीएम और किसान नेता चौधरी चरण सिंह, और सबसे चौंकाने वाला नाम कांग्रेस के पूर्व पीएम पी.वी. नरसिम्हा राव शामिल थे. इनके साथ ही भाजपा के भीष्म पितामह लाल कृष्ण आडवाणी और कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन को भी यह सम्मान मिला.
पद्म सम्मान बोलते अलग कहानी
इस बार के पद्म सम्मान एक बड़ी कहानी कहते हैं. वे कहते हैं कि चुनावी राजनीति में भले ही कड़वाहट और प्रतिस्पर्धा चरम पर हो, लेकिन मोदी सरकार के तहत नागरिक सम्मानों ने समावेशिता और ऐतिहासिक स्वीकार्यता का परिचय दिया है. जहां एक तरफ यह बहस जारी रहती है कि राजनीति सार्वजनिक जीवन को बांट रही है, वहीं पिछले एक दशक में पद्म पुरस्कारों और भारत रत्न का पैटर्न एक ‘काउंटरपॉइंट’ पेश करता है, जहां राष्ट्र के लिए किया गया योगदान, प्रतीकात्मक रूप से ही सही, पक्षपात से ऊपर उठ चुका है.

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