Last Updated:January 09, 2026, 22:29 IST
India-America Relation : भारत और अमेरिका के रिश्ते इस समय सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. अमेरिका लगातार धमकी और दबाव से भारत को झुकाना चाहता है, लेकिन भारत अपनी रणनीति के बलबूते उसे करारा जवाब देने में लगा हुआ है.
भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश 21 फीसदी कम कर दिया है. नई दिल्ली. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर मोटा टैरिफ लगाकर सोचा था कि उनके आगे सरकार झुक जाएगी, लेकिन भारत ने भी ऐसा उल्टा दांव मारा कि टैरिफ से ज्यादा नुकसान अमेरिका को ही झेलना पड़ रहा है. ब्लूमबर्ग ने आंकड़े जारी कर बताया है कि भारत का अमेरिका की ट्रेजरी में निवेश तेजी से नीचे आ रहा है. आलम ये है कि महज एक साल की अवधि में ही इसमें 21 फीसदी की गिरावट दिख रही है. इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.
ब्लूमबर्ग ने बताया कि भारत ने पिछले एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में अपनी हिस्सेदारी तेजी से घटाई है. यह देश की विदेशी मुद्रा भंडार की प्रबंधन रणनीति में बदलाव की ओर सीधा इशारा कर रहा है. सरकार ने ग्लोबल इकनॉमी में आ रहे आर्थिक और भू-राजनैतिक बदलाव के बीच यह रणनीति अपनाई है. इसका मकसद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती लाना और ग्लोबल इकनॉमी में आ रहे उतार-चढ़ाव से बचाना है.
कितना कम हो गया भारत का निवेश
ब्लूमबर्ग ने बताया कि अमेरिका की ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी 31 अक्टूबर, 2024 के मुकबले 31 अक्टूबर, 2025 तक 21 फीसदी कम हो गई है. अब यह 241.4 अरब डॉलर से गिरकर महज 190.7 अरब डॉलर के आसपास है. इसका मतलब है कि भारतीय निवेश में सिर्फ एक साल के भीतर ही करीब 50 अरब डॉलर यानी 4.5 लाख करोड़ रुपये की गिरावट देखी गई है. बीते चार साल में यह पहला मौका है, जब भारत का निवेश अमेरिकी ट्रेजरी में नीचे आया है. इससे पहले भारत की होल्डिंग या तो बढ़ती थी या फिर कम स्थिर रहती थी.
रिटर्न बढ़ने पर भी कम हो रही हिस्सेदारी
भारत के अमेरिकी ट्रेजरी यानी सरकारी बॉन्ड में निवेश ऐसे समय में कम हो रहा है, जब वहां रिटर्न और बेहतर होता जा रहा. अभी देखें तो 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी पर रिटर्न 4 फीसदी से बढ़कर 4.8 फीसदी हो गया है. यह विदेशी निवेशकों की डिमांड को बनाए रखने के लिए पर्याप्त माना जाता है. हालांकि, इकनॉमिस्ट का कहना है कि अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की होल्डिंग कम होने का कारण रिटर्न नहीं, बल्कि उसके विदेशी मुद्रा भंडार की रणनीतिक समीक्षा है.
क्या कहते हैं अर्थशास्त्री
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपन्विता मजूमदार का कहना है कि अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की होल्डिंग कम होने की वजह देश के डयवर्सिफिकेशन की ओर से बढ़ते रुख और विदेशी मुद्रा भंडार की रणनीति में आ रहे बदलाव का नतीजा है. इसका मतलब है कि भारत अब अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता घटा रहा है. खासकर ऐसे समय में जब डॉलर इंडेक्स में नरमी का रुख दिख रहा है. इसका एक बड़ा कारण अमेरिका में श्रम बाजार की कमजोर स्थिति भी है. जाहिर है कि भारत की रणनीति का अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर पड़ रहा है.
कम हो रहा डॉलर का आकर्षण
मजूमदार का कहना है कि भारत को इस बात की पूरी आशंका है कि डॉलर के कमजोर होने की संभावना बढ़ती जा रही है. फेडरल रिजर्व इसे थामने के लिए ब्याज दरों में कटौती का माहौल बना रहा है, लेकिन बदलती परिस्थितियों में डॉलर आधारित संपत्तियों में निवेश का आकर्षण और कम होता जा रहा है. यही वजह है कि बदली भू-राजनीतिक परिस्थितियों में आरबीआई सहित दुनियाभर के तमाम केंद्रीय बैंकों ने अपने-अपने विदेशी मुद्रा भंडार की समीक्षा करनी शुरू कर दी है.
अमेरिका को चोट पहुंचा रही भारत की बदलती रणनीति
मार्केट एक्सपर्ट का कहना है कि भारत अपने भंडार का एक हिस्सा अब दूसरे विकल्पों में निवेश कर रहा है. इसमें सोना, दूसरे देशों के सरकारी बॉन्ड, गैर डॉलर वाली संपत्तियां आदि शामिल हैं. फिलहाल सबसे ज्यादा जोर सोने पर है, क्योंकि दुनियाभर में बढ़ रहे भू-राजनैतिक तनावों से यही बचा सकता है. मजूमदार का कहना है कि आरबीआई ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा दी है. वैसे तो कुल मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी आज भी सबसे ज्यादा है, लेकिन बदलती रणनीति से अमेरिका की मुद्रा को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचना शुरू हो गया है और यही ट्रंप की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण भी है.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि...और पढ़ें
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
January 09, 2026, 22:25 IST

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