पराक्रम दिवस: ICS की मखमली नौकरी ठुकराने वाले सुभाष चंद्र बोस कैसे बने भारत के 'नेताजी'?

1 hour ago

Last Updated:January 22, 2026, 23:33 IST

Parakram Diwas 2026: 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में वो बालक जन्मा जिसने आगे चलकर ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी थी. सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व बचपन से ही अत्यंत मेधावी और क्रांतिकारी था. उन्होंने लंदन में सबसे कठिन आईसीएस परीक्षा में चौथी रैंक हासिल की थी. लेकिन उनका दिल और आत्मा केवल भारत की आजादी के लिए धड़कते थे. 1921 में उन्होंने इस शाही नौकरी को लात मार दी और स्वदेश लौट आए. उन्होंने महात्मा गांधी और चितरंजन दास के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई शुरू की. नेताजी केवल बातों में नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई और पराक्रम में विश्वास रखते थे. उन्होंने देश और विदेश में घूमकर भारतीयों को संगठित करने का महान कार्य किया. उनकी रणनीति और 'आजाद हिंद फौज' के गठन ने अंग्रेजों को डरा दिया था. आज पूरा भारत उनके जन्मदिन को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाता है.

सुभाष चंद्र बोस के पिता उन्हें एक बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहते थे. पिता की इच्छा पूरी करने के लिए वे इंग्लैंड गए और परीक्षा पास की. उस दौर में आईसीएस अधिकारी बनना किसी राजा बनने जैसा सम्मान होता था. लेकिन बोस ने ब्रिटिश सरकार की गुलामी करना अपनी आत्मा के खिलाफ माना. उन्होंने अपने भाई को पत्र लिखकर साफ कर दिया था कि वे अंग्रेजों के नीचे काम नहीं करेंगे. 1921 में उन्होंने इस्तीफा दिया और भारत आकर पूरी तरह राजनीति में कूद पड़े. उनके मन में केवल एक ही लक्ष्य था कि भारत को पूर्ण स्वराज मिलना चाहिए. उन्होंने युवाओं को यह संदेश दिया कि आजादी बलिदान मांगती है और इसके लिए तैयार रहें.

कांग्रेस में रहते हुए भी नेताजी के विचार बहुत उग्र और स्पष्ट थे. वे जानते थे कि अहिंसा के साथ-साथ शक्ति प्रदर्शन भी बहुत जरूरी है. उन्होंने 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की और फिर विदेश चले गए. वहां उन्होंने युद्ध बंदियों और भारतीयों को जोड़कर 'आजाद हिंद फौज' तैयार की. उन्होंने सिंगापुर में अपनी सेना को संबोधित करते हुए एक ऐतिहासिक नारा दिया था. 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' ने पूरे देश में क्रांति ला दी. इस नारे ने हर भारतीय के दिल में आजादी की एक नई लौ जला दी थी. उनकी सेना में महिलाओं के लिए भी 'झांसी की रानी' रेजिमेंट बनाई गई थी. यह उनके आधुनिक और समावेशी विजन का एक बहुत बड़ा प्रमाण था.

नेताजी का मानना था कि दुश्मन का दुश्मन हमारा सबसे अच्छा दोस्त होता है. इसी रणनीति के तहत वे जर्मनी और जापान जैसे देशों से मिलने गए थे. उन्होंने बर्लिन में 'फ्री इंडिया सेंटर' की स्थापना करके अपना मिशन शुरू किया. आजाद हिंद रेडियो के माध्यम से वे सीधे भारतीयों से संवाद करते थे. उनके भाषणों ने ब्रिटिश सेना में काम कर रहे भारतीय सैनिकों को भी प्रभावित किया.

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जापान के सहयोग से उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीपों को आजाद कराया था. उन्होंने इन द्वीपों को 'शहीद' और 'स्वराज' का नया नाम दिया था. उनकी इस अंतरराष्ट्रीय कूटनीति ने अंग्रेजों को पूरी दुनिया में शर्मिंदा कर दिया था. ब्रिटिश राज को पहली बार महसूस हुआ कि अब उनकी सत्ता जाने वाली है.

भारत सरकार ने साल 2021 से उनकी जयंती को 'पराक्रम दिवस' घोषित किया. यह दिन हमें याद दिलाता है कि आजादी कभी भी मुफ्त में नहीं मिलती है. नेताजी का जीवन अनुशासन, साहस और अदम्य इच्छाशक्ति का एक जीता जागता उदाहरण है. उन्होंने सिखाया कि संसाधनों की कमी के बावजूद बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं.

आज के समय में नेताजी की विचारधारा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में बहुत सहायक है. वे चाहते थे कि भारत विज्ञान, उद्योग और शिक्षा में दुनिया का सिरमौर बने. उनकी विरासत केवल किताबों तक सीमित नहीं है बल्कि हर देशभक्त के दिल में है. हमें उनके बताए रास्ते पर चलकर एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनाना चाहिए. यही उनके प्रति हमारी सच्ची और सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी.

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First Published :

January 22, 2026, 23:33 IST

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