जंग के बीच ईरानी दूतावास पहुंचे भारत के विदेश सचिव, कूटनीति की बिसात पर भारत की 'नपी-तुली' चाल

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जंग के बीच ईरानी दूतावास पहुंचे भारत के विदेश सचिव, क्‍यों इतना खास?

Last Updated:March 05, 2026, 16:30 IST

ईरान पर अमेर‍िका और इजरायल की बमबारी के बीच भारत के व‍िदेश सच‍िव व‍िक्रम मिसरी गुरुवार को द‍िल्‍ली में ईरानी दूतावास पहुंचे. उन्‍होंने वहां रखे कंडोलेंस बुक पर साइन क‍िया. एक्‍सपर्ट इसे भारत की नपी तुली कूटनीत‍ि कह रहे हैं.

जंग के बीच ईरानी दूतावास पहुंचे भारत के विदेश सचिव, क्‍यों इतना खास?Zoom

विदेश सचिव व‍िक्रम मिसरी ईरानी दूतावास पहुंचे.

मिडिल ईस्ट में बारूद की गंध फैली है, मिसाइलों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हो रही और दुनिया दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है. इस तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास पहुंचे. वहां कंडोलेंस बुक पर भारत की तरफ से संवेदना के शब्‍द ल‍िखे. एक्‍सपर्ट कह रहे क‍ि विदेश सच‍िव का ईरानी दूतावास जाना महज एक औपचारिक मुलाकात नहीं है. इसे कूटनीति की भाषा में ‘स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग’ कहा जाता है.

जब अमेरिका और इजरायल के हमले तेज हों और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक शोक संदेश या इजरायल के विरोध में कड़ा बयान न आया हो, तब विदेश सचिव का वहां जाना कई संदेश देता है.

1. खामोशी और मौजूदगी

भारत की विदेश नीति हमेशा से स्‍ट्रेटज‍िक ऑटोनामी पर टिकी रही है. इसे आसान भाषा में कहें तो हम किसी के पिछलग्गू नहीं बनेंगे, हम अपने हित खुद तय करेंगे. अभी तक भारत ने इजरायल या अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की खुलकर निंदा नहीं की है. न ही खामेनेई के निधन पर वो भावुकता दिखाई है जो शायद एक दशक पहले देखी जाती. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत ईरान को छोड़ रहा है. विदेश सचिव का दूतावास जाना यह बताता है कि भारत के लिए ईरान एक अहम भौगोलिक और ऐतिहासिक साझेदार बना हुआ है. एक्‍सपर्ट के मुताबिक, जब आप बयान नहीं देते, तो आपकी मौजूदगी बयान बनती है. मिसरी का वहां जाना ईरान को यह भरोसा दिलाना है कि मुश्किल वक्त में संवाद के रास्ते बंद नहीं हुए हैं.

2. चाबहार और मध्य एशिया

भारत के लिए ईरान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि मध्य एशिया का दरवाजा है. चाबहार बंदरगाह में भारत ने करोड़ों डॉलर निवेश किए हैं. अगर भारत ईरान से पूरी तरह किनारा कर लेता है, तो अफगानिस्तान और रूस तक पहुंचने का हमारा सपना अधूरा रह जाएगा. विक्रम मिसरी की यह मुलाकात संकेत देती है कि चाहे युद्ध का माहौल हो, भारत अपने आर्थिक और इंफ्रास्ट्रक्चर हितों जैसे INSTC – इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को दांव पर नहीं लगाना चाहता.

‘अरब देश बनाम ईरान’ की पतली राह पर भारत

आज भारत के रिश्ते सऊदी अरब और यूएई (UAE) के साथ अपने इतिहास के सबसे बेहतरीन दौर में हैं. ये देश ईरान के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ इजरायल हमारा सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार है. ऐसे में भारत के विदेश सचिव का ईरानी दूतावास जाना एक ‘बैलेंसिंग एक्ट’ है. यह दुनिया को बताता है कि हम इजरायल के दोस्त हैं, लेकिन ईरान के दुश्मन नहीं. हम आतंक के खिलाफ हैं, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ईरान की भूमिका को भी नकारते नहीं.

क्या यह ‘बैक-चैनल’ डिप्लोमेसी है?

अक्सर जब बड़े नेता सीधे बात नहीं कर पाते, तो पर्दे के पीछे से संदेश भेजे जाते हैं. मुमकिन है कि भारत इस युद्ध में एक ‘मध्यस्थ’ या कम से कम एक ‘शांति दूत’ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा हो. विक्रम मिसरी एक मंझे हुए राजनयिक हैं. उनका वहां जाना यह संकेत हो सकता है कि भारत तनाव को कम करने के लिए कोई गुप्त संदेश या प्रस्ताव साझा कर रहा है.

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Gyanendra Mishra

Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for 'Hindustan Times Group...और पढ़ें

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Delhi,Delhi,Delhi

First Published :

March 05, 2026, 16:30 IST

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