क्या है माघ मेला, ये प्रयागराज के संगम पर ही क्यों, जहां टपका था अमृत, मुगलों ने लगाया था टैक्स

14 hours ago

हर साल मकर संक्रांति के साथ ही प्रयागराज में माघ मेला शुरू होता है, जिसे कुंभ के कम पवित्र नहीं समझा जाता. ये माना जाता है कि इसमें नहाने से भी आपके पाप धुल जाते हैं. प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर लगने वाले इस मेले में हर साल लाखों लोग आते हैं.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत कलश निकला, तो देवताओं और असुरों के बीच छीना-झपटी हुई। इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें चार स्थानों पर गिरीं – हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयाग. इसीलिए इन स्थानों का महत्व बढ़ गया. प्रयागराज यानि संगम के शहर को ‘तीर्थराज’ यानी तीर्थों का राजा कहा जाता है.

मान्यता है कि सृष्टि रचना से पहले ब्रह्मा जी ने प्रयाग पर ही पहला अश्वमेध यज्ञ किया था. इसलिए इसे तीर्थराज कहा जाता है. माघ स्नान से हजारों अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है. माघ मेला आमतौर पर 45 से 50 दिनों तक चलता है. इसकी शुरुआत हर साल मकर संक्रांति (मध्य जनवरी) के दिन पहले मुख्य स्नान के साथ होती .

क्या है माघ मेला?

माघ मेला हिंदू पंचांग के अनुसार ‘माघ’ के महीने में आयोजित होने वाला एक वार्षिक उत्सव है. इसे ‘लघु कुंभ’ के रूप में भी जाना जाता है. फर्क केवल इतना है कि कुंभ मेला हर 12 साल में और अर्धकुंभ हर 6 साल में लगता है, लेकिन माघ मेला हर साल होता है. शास्त्रों के अनुसार, माघ के महीने में सभी देवी-देवता और तीर्थ खुद प्रयाग में निवास करते हैं, इसलिए यहां स्नान का फल अनंत गुना बढ़ जाता है.

माघ मेले में क्या होता है कल्पवास

माघ मेले की सबसे अनूठी विशेषता ‘कल्पवास’ है. संगम की रेती पर टैंट सिटी में कल्पवासी यानि साधक एक महीने तक निवास करते हैं. कल्पवास एक तरह का रोजाना का व्रत, ध्यान और सात्विक जीवन है. कल्पवास करने वाले पूरे माघ महीने संगम तट पर रहते हैं. एक कथा है कि ऐसा करने से पिछले जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. कल्प यानि एक युग के बराबर पुण्य मिलता है. कई संतों की कहानियां हैं जो कल्पवास से आत्मशुद्धि प्राप्त कर मोक्ष पाते हैं.

कल्पवासी अत्यंत कठिन अनुशासन का पालन करते हैं. वे दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करते हैं. जमीन पर सोते हैं. दिन में तीन बार गंगा स्नान करते हैं. यह एक प्रकार का आत्म-संयम और ध्यान का अभ्यास है

तीन नदियों के संगम का क्या मतलब

चूंकि ये संगम गंगा, यमुना और सरस्वती हैं, इसलिए इसे तीन पवित्र नदियों का मिलन कहते हैं. गंगा जो पापों का नाश करती है. यमुना भक्ति का प्रतीक है तो सरस्वती ज्ञान की अदृश्य धारा है.

लोग यहां क्या-क्या करते हैं?

माघ मेले का माहौल भक्ति, सेवा और ज्ञान का मिश्रण होता है. मुख्य स्नान पर्वों जैसे मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी पर लाखों लोग संगम में डुबकी लगाते हैं. यहां तिल, गुड़, ऊनी कपड़े और अन्न दान करने का विशेष महत्व है. मेले के दौरान सैकड़ों पंडालों में साधु-संतों द्वारा धार्मिक चर्चाएं, रामकथा और भागवत पुराण का वाचन होता है.सूर्य देव की उपासना और पितरों का तर्पण भी यहां प्रमुखता से किया जाता है.

मौनी अमावस्या को मेले का सबसे बड़ा स्नान पर्व माना जाता है. इस दिन ऋषि मनु का जन्म हुआ था. संगम का जल अमृत के समान हो जाता है.

और हजारों तंबुओं का शहर

प्रयागराज का माघ मेला प्रबंधन का एक अद्भुत उदाहरण है. प्रशासन द्वारा गंगा की रेती पर एक पूरा अस्थायी शहर बसाया जाता है, जिसमें हज़ारों टेंट लगाए जाते हैं. पीपे के अस्थायी पुल बनाए जाते हैं ताकि लोग नदी पार कर सकें. हज़ारों कर्मचारी तैनात रहते हैं.

टेंट सिटी मतलब दुनिया सबसे बड़ा अस्थायी शहर

टेंट सिटी इसलिए अनूठी होती है क्योंकि वह कुछ हफ्तों के लिए बसाया गया ऐसा महानगर होती है, जो आकार, व्यवस्था और आबादी तीनों में किसी भी स्थायी शहर से कम नहीं, बल्कि कई मामलों में उससे ज़्यादा जटिल होती है. यहां हर तरह की ऐसी व्यवस्था होती है, जो किसी शहर में की जाती है. सड़कें और सेक्टर होते हैं. बिजली ग्रिड और पेयजल पाइपलाइन होते हैं. ड्रेनेज और शौचालय होते हैं. साथ में अस्पताल, थाने, फायर स्टेशन, पोस्ट ऑफिस, बैंक, मीडिया सेंटर.

ये शहर यहां हफ्तों में खड़ा हो जाता है.इस टैंट सिटी की आबादी कुंभ के दिनों में कभी कभी बहुत ज्यादा हो जाती है, तब ये दुनिया के किसी भी शहर को मात देने लगती है. हर सेक्टर में अधिकारी तैनात होते हैं. पुलिस की मुकम्मल व्यवस्था होती है. सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है. सबसे अनोखी बात टेंट सिटी नदी के फ्लडप्लेन पर बसती है, जहां साल में आधे समय पानी रहता है.

वैज्ञानिक आधार भी है

माघ मेले का समय ऐसा होता है जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड कम होने लगती है. मौसम बदलने लगता है. संगम की ठंडी जलधारा में स्नान करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. खुले आकाश के नीचे सात्विक जीवन जीने से मानसिक तनाव कम होता है।

जब माघ मेले पर मुगलों ने टैक्स लगाया

अकबर ने प्रयाग को “इलाहाबाद” नाम दिया और किला बनवाया. वह 1575 में बीरबल के साथ माघ मेले में गया. उसने हिंदुओं के बड़े जमावड़े से डर कर माघ मेले पर टैक्स लगा दिया. हालांकि इसका बहुत विरोध हुआ. तब उसने ये टैक्स वापस ले लिया. अबुल फजल की किताब आइन-ए-अकबरी में प्रयाग को हिंदुओं का “तीर्थों का राजा” कहा गया, खासकर माघ मेले के समय.

औरंगजेब ने नागा साधुओं को देखकर छेड़छाड़ नहीं की, क्योंकि वे निर्वस्त्र और बेखौफ थे लेकिन उसने कुछ परंपराओं पर रोक लगाई. अकबर और औरंगजेब दोनों ने लेटे हए हनुमान जी मूर्ति हटाने की कोशिश की, लेकिन वह जमीन में धंस गई – इसलिए आज मूर्ति 6-7 फीट नीचे है.

माघ मेला कितना पुराना

माघ मेला कम से कम 2,000 से 2,500 साल पुरानी परंपरा है. हो सकता है कि और भी पुराना. ऋग्वेद, ब्राह्मण ग्रंथों और धर्मसूत्रों में माघ मास, गंगा-स्नान, प्रयाग को विशेष पुण्यस्थल बताया गया है. पुराणों में माघ स्नान को साल का सर्वोच्च व्रत कहा गया है.मौर्य काल यानि ईसा पूर्व 3 सदी में प्रयाग प्रमुख तीर्थ नगरी के तौर पर स्थापित हो चुका था. इसी दौरान वार्षिक माघ स्नान की तरीके से शुरुआत हुई.

सातवीं सदी में प्रयाग आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा, माघ महीने में गंगा-यमुना संगम पर विशाल स्नान और दान का आयोजन होता है, जिसमें राजा हर्ष खुद भाग लेते हैं. यह पहला ठोस ऐतिहासिक दस्तावेज़ी प्रमाण है. ब्रिटिश काल में इसे आधिकारिक पहचान मिली.

Read Full Article at Source