कैसे लाया जाता है लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, थोड़ी अलग इसकी प्रक्रिया

2 hours ago

कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है. कांग्रेस का आरोप है कि लोकसभा स्पीकर विपक्ष के नेता को बोलने का मौका नहीं देते हैं. दूसरे जिस तरह उन्होंने कथित तौर पर प्रधानमंत्री पर संसद में विपक्षी सदस्यों द्वारा हमले की आशंका जाहिर की, उससे भी विपक्ष नाराज है. लिहाजा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें झटका देने की तैयारी तो है ही. हां, जब भी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ ये प्रस्ताव लाया जाता है तो इसकी प्रक्रिया कुछ अलग होती है.

गौरतलब है कि विपक्ष खासकर कांग्रेस लोकसभा अध्यक्ष से नाराज चल रही है. कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान लोकसभा स्पीकर ने नियमों का हवाला देकर भाषण ही पूरा नहीं करने दिया. वहीं, दूसरी तरफ बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कुछ किताबों का हवाला देकर इंदिरा गांधी समेत कांग्रेस के पूर्व पीएम पर निशाना साधा था.

इसके अलावा लोकसभा में हंगामे के कारण कांग्रेस के साथ-साथ कुल 8 सांसद पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिए गए हैं. इसके अलावा कांग्रेस लोकसभा अध्यक्ष की उन टिप्पणियों से बेहद नाराज है जिसमें उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के कई सदस्य पीएम के आसन के पास पहुंच कर कोई भी अप्रत्याशित घटना कर सकते थे. इसलिए उन्होंने पीएम से सदन में ना आने का आग्रह किया.

ये अविश्वास नहीं बल्कि हटाने का प्रस्ताव होता है

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया आम सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से काफी अलग और कम जानी-पहचानी है.
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास नहीं, बल्कि “हटाने का प्रस्ताव” यानि मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है.

क्या है अनुच्छेद 94 सी

इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत लाया जाता है, जो लोकसभा के कार्य संचालन नियम की बात करता है. अनुच्छेद 94(c) भारतीय संविधान का एक हिस्सा है, जो लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद से हटाए जाने से संबंधित है. हालांकि संविधान का आर्टिकल 94 इस पूरी प्रक्रिया के बारे में बताता है, इसकी व्यवस्था देता है.

तीन तरीकों से हट सकते हैं

– यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहते, तो उनका पद खुद ब खुद खाली हो जाता है
– वे किसी भी समय त्यागपत्र दे सकते हैं (अध्यक्ष उपाध्यक्ष को, उपाध्यक्ष अध्यक्ष को लिखित रूप में).
– वे लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प से पद से हटाए जा सकते हैं.

अनुच्छेद 94 सी क्या कहता है?

वे (अध्यक्ष या उपाध्यक्ष) लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाए जा सकते हैं.

इसकी शर्त क्या है

– लोकसभा के कुल सदस्यों में से कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी है
– नोटिस लिखित होना चाहिए
– नोटिस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं
यानी कोई भी सांसद अचानक खड़े होकर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता।

नोटिस देने के बाद क्या होता है?

नोटिस मिलने के बाद स्पीकर खुद उस कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करता
उस दिन सदन की कार्यवाही डिप्टी स्पीकर या किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा चलाई जाती है

हटाने के लिए साधारण बहुमत ही काफी

यह प्रावधान लोकसभा के पीठासीन अधिकारियों की जवाबदेही और सदन की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करता है, क्योंकि उन्हें हटाने के लिए साधारण बहुमत ही काफी है, न कि विशेष बहुमत.

जितने सांसद तब लोकसभा में उपस्थित हों और मतदान कर रहे हों, उसमें उनमें से 50फीसदी + 1 सांसद का समर्थन होना चाहिए. इसके लिए विशेष बहुमत यानि दो तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती.

अगर प्रस्ताव पास हो जाए तो?

– तो स्पीकर तुरंत पद से हट जाता है
– वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं
– फिर नया स्पीकर चुना जाता है

क्या ऐसा कभी हुआ है?

– अब तक स्वतंत्र भारत में लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव कभी पास नहीं हुआ. नोटिस तो दी गई, बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग तक मामला नहीं पहुंचा.

कब कब नोटिस दिया गया

1967 में डॉ. नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ चौथी लोकसभा में ये नोटिस दिया गया. 1967 के चुनाव में कांग्रेस कमजोर हुई. विपक्ष ने आरोप लगाया कि स्पीकर
कांग्रेस के पक्ष में काम कर रहे हैं. विपक्ष को बोलने नहीं दिया जा रहा.
क्या हुआ? – हटाने का नोटिस दिया गया लेकिन मतदान तक बात नहीं पहुंची. बाद में वही नीलम संजीव रेड्डी 1977 में भारत के राष्ट्रपति बने.

1987–88 में आठवीं लोकसभा में बलराम जाखड़ लोकसभा अध्यक्ष थे. बोफोर्स घोटाले पर बहस के दौरान विपक्ष ने आरोप था कि सरकार को बचाने के लिए स्पीकर नियमों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
क्या हुआ – हटाने का नोटिस दिया गया. पर्याप्त समर्थन नहीं जुट पाने के कारण ये मामला आगे नहीं बढ़ पाया. जाखड़ जी को अक्सर सबसे शक्तिशाली स्पीकरों में गिना जाता है.

वर्ष 2001 में 13वीं लोकसभा में जी.एम.सी. बालयोगी स्पीकर थे. इस दौरान एनडीए की सरकार थी. विपक्ष का आरोप था कि सरकार के पक्ष में फैसले में स्पीकर स्थगन प्रस्तावों को खारिज कर रहे हैं.
क्या हुआ? – नोटिस दिया गया. चर्चा तो हुई, लेकिन प्रस्ताव औपचारिक वोटिंग तक नहीं पहुंचा. बालयोगी को व्यक्तिगत तौर पर निष्पक्ष माना जाता था, इसलिए मामला ठंडा पड़ गया.

वर्ष 2011 में पंद्रहवीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार थीं. तब विपक्ष ने स्पीकर को हटाने की सबसे गंभीर कोशिशों में एक की. 2G और CWG घोटालों पर बहस के दौरान विपक्ष का आरोप था स्पीकर सरकार को “कवच” दे रही हैं. नोटिस और स्थगन बार-बार खारिज कर रही हैं.
क्या हुआ? – बीजेपी और कुछ अन्य दलों ने स्पीकर को हटाने का नोटिस दिया. बहुमत न होने से प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा.

वर्ष 2020 सत्रहवीं लोकसभा में ओम बिरला ही स्पीकर थे. कृषि कानूनों को लेकर जब विपक्ष ने विरोध करना शुरू किया तो हंगामे की वजह से स्पीकर ने
विपक्षी सांसदों का निलंबन किया. उन पर गलत तरीके से निलंबन के अलावा सीमित चर्चा का आरोप लगने लगा. विपक्षी दलों ने तब उन्हें हटाने के नोटिस की बात सार्वजनिक रूप से कही
क्या हुआ – औपचारिक रूप से नोटिक स्वीकार होने लायक संख्या नहीं जुटी.

हालांकि देखा जाए तो स्पीकर के खिलाफ नोटिस लोकतांत्रिक असहमति का प्रतीक ज्यादा रहा है लेकिन भारतीय राजनीति में अब तक यह प्रतीकात्मक हथियार ही रहा है. वास्तविक नहीं.

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