Last Updated:January 20, 2026, 15:46 IST
Supreme Court SIR Hearing LIVE Updates: सुप्रीम कोर्ट विभिन्न राज्यों में विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया की वैधता पर सुनवाई कर रहा है. वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तमिलनाडु मामले को CJI सूर्यकांत की पीठ के समक्ष रखा. उन्होंने इसे पश्चिम बंगाल जैसी तार्किक विसंगति का मामला बताया. कोर्ट अब 27 जनवरी को तमिलनाडु याचिका पर विस्तार से सुनवाई करेगा. चुनाव आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची शुद्ध करने के लिए जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. नई दिल्ली: विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी जंग तेज हो गई है. CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मंगलवार को चुनाव आयोग (ECI) ने 73 साल पुराने कानून का दांव चला. आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि चुनाव प्रक्रिया को शुद्ध रखना उनका संवैधानिक धर्म है. वहीं, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस प्रक्रिया में ‘तार्किक विसंगतियों’ का हवाला देते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया. अदालत अब इस पूरे विवाद पर 27 जनवरी को विस्तार से सुनवाई करेगी.
मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तमिलनाडु मामले को कोर्ट के सामने रखते हुए इसे पश्चिम बंगाल की स्थिति के समान बताया. उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह बंगाल में ‘तार्किक विसंगति’ (Logical Inconsistency) के नाम पर लाखों लोगों को नोटिस दिए गए हैं, वैसी ही अराजकता तमिलनाडु में भी देखने को मिल रही है.
चुनाव आयोग (ECI) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने आयोग के अधिकारों का बचाव किया. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 324 के तहत आयोग के पास मतदाता सूची को शुद्ध करने की पूर्ण शक्ति है. हालांकि याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नागरिकता की जांच करना चुनाव आयोग के कार्यक्षेत्र से बाहर है. कोर्ट ने अब इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 27 जनवरी को तय की है.
तमिलनाडु और बंगाल में एक जैसी विसंगति का दावा
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कोर्ट का ध्यान उन तकनीकी आधारों की ओर खींचा जिन्हें आयोग ‘तार्किक विसंगति’ कह रहा है. बंगाल में करीब 1.36 करोड़ लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं. सिब्बल के अनुसार तमिलनाडु में भी इसी तरह की प्रक्रिया अपनाई जा रही है जिससे आम जनता में डर और भ्रम का माहौल है.
SIR मामले के मुख्य बिंदु
नोटिस का आधार: माता-पिता और बच्चों की उम्र में कम अंतर या नाम की स्पेलिंग में मामूली गलती को ‘संदिग्ध’ मानकर नोटिस दिए जा रहे हैं.
नागरिकता का सवाल: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि SIR के जरिए आयोग परोक्ष रूप से NRC जैसी प्रक्रिया चला रहा है, जो असंवैधानिक है.
चुनाव आयोग का पक्ष: वकील राकेश द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि आयोग का उद्देश्य केवल डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को पारदर्शी बनाना है.
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने लोगों को हो रही परेशानी पर चिंता व्यक्त की है. कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया है कि किसी भी वैध मतदाता का नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटाया जाना चाहिए. तमिलनाडु के मामले में 27 जनवरी की तारीख काफी अहम मानी जा रही है क्योंकि उस दिन कोर्ट प्रक्रिया पर अंतरिम रोक या नए दिशानिर्देश जारी कर सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि “मतदाता सूची में शामिल होना एक अधिकार है और दस्तावेजों के सत्यापन के नाम पर नागरिकों को मानसिक तनाव नहीं दिया जा सकता.”
चुनाव आयोग की दलील: 1950 बनाम 1951 का अधिनियम
सुनवाई के दौरान वकील राकेश द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची की तैयारी और चुनावों का संचालन दो अलग-अलग वैधानिक प्रावधानों के तहत होता है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि:
· 1950 का अधिनियम: यह मुख्य रूप से चुनावों की तैयारी और मतदाता सूची के पंजीकरण से संबंधित है.
· 1951 का अधिनियम: यह चुनावों के वास्तविक संचालन और शर्तों को निर्धारित करता है.
· धारा 62 का उल्लेख: उन्होंने 1951 अधिनियम की धारा 62 का हवाला देते हुए कहा कि पंजीकरण के लिए निर्धारित शर्तों का पालन अनिवार्य है. आयोग का तर्क है कि SIR के जरिए केवल उन्हीं लोगों को हटाया जा रहा है जो पात्रता की शर्तों को पूरा नहीं करते.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और...और पढ़ें
First Published :
January 20, 2026, 15:46 IST

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