Last Updated:January 28, 2026, 16:04 IST
Supreme Court SIR Hearing Live Updates: सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को चुनौती दी. उन्होंने कहा कि नागरिकता तय करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है. चुनाव आयोग केवल चुनाव प्रबंधन देख सकता है. सिब्बल ने दलील दी कि कोई प्रशासनिक अधिकारी महज एक फॉर्म के आधार पर किसी की नागरिकता नहीं छीन सकता. यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियम आधारित होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में आज एसआईआर पर सुनवाई हुई. नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में आज विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम सुनवाई हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने आज चुनाव आयोग से तमिलनाडु में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर जवाब मांगा है. डीएमके नेता आरएस भारती की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) सूची प्रकाशित करने का निर्देश देने पर विचार किया. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जिस तरह पश्चिम बंगाल में सूची सार्वजनिक करने के आदेश दिए गए थे, वैसा ही नियम तमिलनाडु में भी लागू होना चाहिए. सीजेआई सूर्यकांत ने मौखिक रूप से सहमति जताते हुए कहा कि बंगाल वाले निर्देश तमिलनाडु पर भी लागू होने चाहिए.
उधर, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव प्रक्रिया पर चुनाव आयोग का नियंत्रण पारदर्शी और तर्कसंगत होना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकता तय करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है चुनाव आयोग के पास नहीं. सिब्बल ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी की नागरिकता केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं छीनी जा सकती. इसपर सीजेआई सूर्यकांत की बेंच में मौजूद जस्टिस बागची ने इस पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए चुनाव आयोग की पूर्ण शक्तियों पर चर्चा की.
कोर्ट रूम में कपिल सिब्बल और जस्टिस बागची के बीच बहस
कपिल सिब्बल: आइए अनुच्छेद 324 और 326 को देखते हैं. इस पर कोई विवाद नहीं कर सकता कि चुनाव प्रक्रिया चुनाव आयोग के नियंत्रण में है. सवाल यह है कि वह नियंत्रण कितना पारदर्शी है? क्या यह नियमों पर आधारित प्रक्रिया है? यह एक प्रशासनिक कार्य है और हर प्रशासनिक कार्य का एक ठोस कारण होना चाहिए.
सिब्बल: जहां तक अनुच्छेद 324 का संबंध है, हमें कोई समस्या नहीं है. हम उस प्रक्रिया को चुनौती दे रहे हैं जिसके जरिए यह सब किया गया है. (सिब्बल ने संविधान का अनुच्छेद 326 पढ़ा).
सिब्बल: बिजनेस रूल्स के तहत, गृह मंत्रालय का आंतरिक सुरक्षा विभाग नागरिकता के मुद्दों को देखता है. संविधान के अनुसार यह पूरा क्षेत्र केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है.
सिब्बल: आखिर यह कौन तय करता है कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है? यह भारत सरकार तय करती है. चुनाव आयोग यह फैसला नहीं कर सकता क्योंकि कुछ देने की शक्ति में उसे वापस लेने की शक्ति भी शामिल होती है. यदि कोई मेरी नागरिकता पर सवाल उठाता है तो फॉर्म 7 है. फिर उसे प्रमाण देना होगा.
जस्टिस बागची: ऐसी स्थिति में फैसला कौन करता है केंद्र सरकार या चुनाव आयोग?
सिब्बल: जाहिर तौर पर केंद्र सरकार क्योंकि नागरिकता छीनी नहीं जा सकती. अब फॉर्म 7 देखें. आपत्ति या नाम हटाने के लिए दिए गए कारण को साबित करने का बोझ आवेदक पर होता है.
सिब्बल: मान लेते हैं कि ERO (निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी) निर्णय ले सकता है. तो क्या जिस दिन नाम हटा, उस दिन मैंने अपनी नागरिकता खो दी?
जस्टिस बागची: नहीं, आप केवल मतदाता सूची में रहने का अपना अधिकार खो देते हैं.
सिब्बल: लॉर्डशिप का कहना है कि ERO को मुझे बाहर करने के उद्देश्य से यह तय करने का अधिकार है कि मैं भारत का नागरिक नहीं हूं.
जस्टिस बागची: नागरिकता अधिनियम के तहत अंतिम निर्णय सरकार के पास है. चुनाव आयोग का जवाब था कि चूंकि मतदाता सूची तैयार करने की संवैधानिक शक्ति उनके पास है, इसलिए नागरिकता निर्धारण के अधिकार पर उनका पूर्ण नियंत्रण होगा.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और...और पढ़ें
First Published :
January 28, 2026, 15:54 IST

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