Love Story: टायपिस्ट बनकर आईं नेताजी सुभाष बोस के पास, फिर कैसे हुआ प्यार और सीक्रेट शादी

4 hours ago

जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस 1930 के दशक में तबीयत खराब होने पर तीन साल के लिए यूरोप रहने गए तो उनको टाइपिस्ट की जरूरत पड़ी. तब एमिली शेंकल उनकी टाइपिस्ट बनकर नौकरी करने आईं. फिर दोनों के रिश्ते कुछ इस तरह बने कि दोनों में प्यार हो गया. फिर उन्होंने सीक्रेट मैरिज की. इसका पता तभी चल सका, जबकि नेताजी की तायहोकु में विमान हादसे में कथित तौर पर मृत्यु की खबर आई. यहां तक कि उनके परिवारवालों को भी इसके बारे में कुछ नहीं मालूम था. इसका पता उन्हें कैसे चला, इसकी भी एक कहानी है. शादी से उन्हें एक बेटी हुई, जो अब जर्मनी में रहती हैं.

“तुम पहली महिला हो, जिससे मैने प्यार किया. भगवान से यही चाहूंगा कि तुम मेरे जीवन की आखिरी स्त्री भी रहो.”

पत्र में प्यार भरी ये लाइनें सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1934 के आसपास उस महिला को लिखीं, जिससे वो ज़बरदस्त प्यार करते थे. उन्होंने अपने पत्र की शुरुआत ‘मेरे हृदय की रानी’ (द क्वीन ऑफ माई हार्ट) से की. आगे लिखा, “ये तुम्हीं हो जिसकी वजह से मैं अपने देश से दूरी के दर्द को भूल पाया.”

इसी पत्र में उन्होंने अपने प्यार को उड़ेलते हुए लिखा,

“मैने कभी नहीं सोचा था कि एक महिला का प्यार मुझको बांध भी सकेगा. इससे पहले बहुतों ने मुझे प्यार करने की कोशिश की लेकिन मैने किसी की ओर नहीं देखा लेकिन तुमने मुझे अपना बना ही लिया.”

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1934 से लेकर जिंदा रहने तक एमिली शेंकल को ढेर सारे पत्र लिखे. उसमें से 200 से ज्यादा पत्र बाद में मिले. उन्हें प्रकाशित भी किया गया. सुभाष अपने कॉलेज के दिनों से लंदन में आईसीएस एग्जाम के लिए जाने तक ऐसे शख्स थे, जिनके ऊपर लड़कियां और महिलाएं जान छिड़कतीं थीं. वह न केवल सुदर्शन व्यक्तित्व थे, बल्कि जोशीले, जीनियस और कहीं भी लीडर बनकर छा जाने वाले.

उनमें कुछ ऐसी खास बात थी, जो उन्हें दूसरों से अलग करती थी. ऐसे में जाहिर ही था लड़कियां ऐसे सुदर्शन युवक की ओर खींची चली आएं. हालांकि सुभाष आमतौर उनसे दूर रहना पसंद करते थे. उनके जीवन में ऐसी महिलाओं की कतई कमी नहीं थी, जो उनके प्रति प्यार जताती रहीं. हालांकि उन्होंने ऐसे संबंधों से हमेशा एक दूरी बनाए रखी.

फाइल फोटो

तब एमिली को पत्र लिख प्यार जताते थे

इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के जनवरी 2005 के अंक में शर्मिला बोस ने इस संबंध में “लव इन द टाइम ऑफ वारः सुभाष चंद्र बोस जर्नी टू नाजी जर्मनी (1941) एंड टुवार्ड्स द सोवियत यूनियन (1945)” शीर्षक से लिखे लेख में सुभाष के एमिली को लिखे पत्रों की चर्चा की है.

इस लेख के अनुसार 1937 में सुभाष ने भारत से अपनी प्रेयसी को एक पत्र लिखा, “ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता, जब तुम्हारी याद नहीं आती. तुम हमेशा यादों में साथ होती हो. मैं बता नहीं सकता कि तुम्हारे अलावा मुझे और कोई याद नहीं आता..ये भी नहीं बता सकता कि मैं इन दिनों कितना अकेला और उदास महसूस कर रहा हूं..”.उन्हीं दिनों सुभाष की आत्मकथा लिख रहे लियोनार्डो गॉर्डन को भी सुभाष के प्यार का अहसास हो गया था.

कैसे हुई पहली मुलाकात

इस प्रेम कथा को जानने समझने के लिए हमें वर्ष 1934 की ओर जाना होगा, जब सुभाष पहली बार आस्ट्रियन युवती एमिली शेंकल से मिले थे. 1934 में सुभाष की तबीयत खराब थी. उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत से निर्वासित कर दिया था. लिहाजा वो यूरोप चले गए. उन्हें वियना में रहने की सलाह दी गई. ताकि स्वास्थ्यलाभ कर सकें.

सुभाष वहां से भारत में साथियों और कांग्रेस के नेताओं को लगातार पत्र लिखते. उनके खतों के जवाब देते रहते थे. उन्हें एक ऐसे मददगार की जरूरत थी, जो उनके पत्र और दस्तावेजों को टाइप कर सके. अंग्रेजी का जानकार हो. इसी दौरान वियना में सुभाष के मित्र मिस्टर माथुर ने उन्हें टाइपिस्ट और स्टेनोग्राफर के तौर पर मिस एमिली शेंकल से मिलवाया.

दोनों में प्यार हो गया

एमिली खूबसूरत और युवा थीं. पढ़ी लिखी थीं. अंग्रेजी में टाइप करना जानती थीं. उन्हें नौकरी की जरूरत भी थी. लिहाजा वह वियना में सुभाष के सहायक के तौर पर उनका काम करने लगीं. काम के दौरान वो करीब आए. एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने लगे. उनमें प्यार हो गया.

उसी दौरान दोनों ने यूरोप में कुछ जगहों की यात्राएं भी साथ-साथ कीं. 1936 में सुभाष वापस भारत लौटे लेकिन एमिली के प्यार की गर्माहट को साथ लिए हुए. वह भारत से उन्हें लगातार पत्र लिखते रहे. जब भी उन्हें बिजी समय से फुरसत मिलती वो एमिली को पत्र भेजते, जिसमें प्यार की अपनी भावनाओं का एज़हार करते. आमतौर पर पत्र की शुरुआत मेरी प्यारी एमिली से होती. सुभाष किसी और को कभी इस तरह पत्र नहीं लिखते थे.

फिर आस्ट्रिया में ही कर ली सीक्रेट मैरिज

1936 में जब सुभाष को एमिली की याद ने बेचैन किया तो वह दिसंबर 1936 में ऑस्ट्रिया के शहर बडगस्टीन पहुंचे. दोनों ने 26 दिसंबर को गुप्त विवाह कर लिया. ये ऐसा विवाह था, जहां न कोई पंडित था और न कोई मंदिर. बस दोनों ने एक दूसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया. दोनों ने इसे गुप्त ही रखने का फैसला किया ताकि अनावश्यक कोहराम नहीं फैले.

सुभाष उस समय कांग्रेस के अगले अध्यक्ष बनने वाले थे. वो नहीं चाहते थे कि उनकी शादी की बात देश में अभी पता चले, इससे उनके सियासी भविष्य और देश की आजादी की लड़ाई दोनों में ही दिक्कतें हो सकती थीं. शादी के बाद दोनों ने कुछ दिन बडगस्टीन में साथ बिताए.

जनवरी 1938 में सुभाष वापस भारत लौट आए, ताकि कांग्रेस के अध्यक्ष का पद संभाल सकें. नेहरू भी उन्हीं दिनों पत्नी कमला के इलाज के लिए यूरोप में थे. उनका सुभाष से संपर्क होता रहता था. 28 फरवरी 1936 को स्विट्ज़रलैंड के लुसाने में जब कमला नेहरू का निधन हुआ तब सुभाष वियना में थे. वह अकेले शख्स थे, जो नेहरू के बुलाने पर कमला के अंतिम संस्कार में वहां पहुंचे.

हालांकि सुभाष के जीवनी लेखक गार्डन ने बाद में लिखा, “एमिली ने उन्हें इसके बारे में बताया था लेकिन उन दोनों में वास्तव में शादी हुई थी, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई.” कुछ बॉयोग्राफर्स ने उनकी शादी को 1941 या 1942 में होना बताया.

सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू की फाइल फोटो

नेहरू इस बारे में जानते थे

संभवतः नेहरू वो शख्स थे, जो सुभाष के प्यार और बाद में हुई शादी से वाकिफ थे. ये वो समय भी था जब सुभाष और नेहरू दोनों एक दूसरे के न केवल करीब थे बल्कि भरोसा भी करते थे. बाद में कांग्रेस की राजनीति और महात्मा गांधी के चलते दोनों में फासले बढ़ते चले गए.

माना जाता है कि जब सुभाष ने ये बात कोलकाता में अपने परिवार को भी नहीं बताई थी, तब भी नेहरू इसके बारे में जानते थे. सुभाष के परिवार को इसकी जानकारी तो बहुत बाद में 40 के दशक में तब हुई जब हवाई हादसे में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मृत्यु की खबर आ चुकी थी. इसी वजह से नेहरू ने देश के आजाद होते ही सुभाष की विधवा के लिए नियमित रूप से एक तय रकम भेजने का प्रावधान किया, जो उन दिनों 6000 रुपए के आसपास बताई जाती है.

सुभाष और एमिली के संबंध करीब नौ साल तक रहे, दोनों बमुश्किल तीन साल ही साथ रहे होंगे. सुभाष जब भी यूरोप में होते थे तो वियना में एमिली के साथ ही रुकते थे. कहा जाता है कि वर्ष 41 से 43 तक सुभाष के करीबी लोगों को उनके इन संबंधों की जानकारी थी. 1941 में वह जब फिर वियना पहुंचे, तो एमिली के साथ लंबा रहे.

वो पत्र उनके परिवार को मिला नहीं

29 नवंबर 1942 को उनकी बेटी अनिता पैदा हुई. तब उन्होंने पहली बार अपने बड़े भाई शरत को कोलकाता में पत्र लिखकर अपनी शादी की जानकारी दी. लेकिन ये पत्र बोस परिवार को कोलकाता में मिला ही नहीं.

बेटी के जन्म के कुछ ही समय बाद आठ जनवरी 1943 को सुभाष जर्मनी से जापान के लिए रवाना हो गए. यहीं एमिली और बेटी अनिता से उनकी आखिरी मुलाकात थी. इसके बाद 1945 में हवाई दुर्घटना में उनके निधन की खबर आई.

बोस परिवार सुभाष के निधन के बाद 40 के दशक के आखिर में एमिली शेंकल से मिला. तब तक कोलकाता में बोस परिवार को सुभाष की शादी और उनकी पत्नी के बारे में जानकारी मिल चुकी थी. उन्होंने सुभाष की विधवा को खुशी-खुशी अपनाया. साथ ही कोलकाता चलकर रहने को कहा. हालांकि एमिली ने इसे स्वीकार नहीं किया.

तब पहली बार बोस परिवार से मिलीं एमिली

सुभाष के बड़े भाई शरत चंद्र बोस के पोते सुगाता बोस ने बाद में उन पर एक बॉयोग्राफी ‘हिज़ मेजेस्टी अपोनेंट्स’ लिखी. जिसमें उन्होंने लिखा कैसे 1948 में सुभाष के बड़े भाई शरत चंद्र बोस अपनी पत्नी, बेटे शिशिर और सुभाष की दोनों बहनों के साथ एमिली और अनिता से वियना में मिले, जो उन दिनों एक टेलीफोन एक्सचेंज में ऑपरेटर की नौकरी कर रही थीं. एमिली के तब भारत नहीं आने की एक वजह ये भी थी कि उनकी मां की तबीयत ठीक नहीं थी और वही उनकी देखरेख कर रही थीं.

इस मुलाकात में एमिली ने बताया कि सुभाष उनके लिए कितने महत्वपूर्ण थे. वह हमेशा सुभाष और उनकी यादों के साथ जीती रहीं. अनिता ने हालांकि अपने पिता के साथ ऐसा समय नहीं गुजारा था कि उन्हें देख-समझ पाएं लेकिन एमिली ने बेटी को पिता के बारे हर छोटी बड़ी जानकारी दी. वो किताबें दीं, जो सुभाष पर थीं.

सुभाष की बेटी भारत भी आईं

सुगाता अपनी किताब में लिखते हैं, ” इस मुलाकात के बाद बोस परिवार के साथ एमिली का एक अपनत्व और संपर्क स्थापित हो गया, जो हमेशा बना रहा. बाद में शरत छह माह के लिए वियना में रहे तो अनिता उनसे काफी हिल-मिल गईं.”

1960 में अनिता कोलकाता भी आईं. लेकिन एमिली कभी भारत नहीं आ सकीं. बेटी अनिता ने बाद में जर्मनी के आगसबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मार्टिन से शादी कर ली. वह खुद भी उसी विश्वविद्यालय में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर बनीं. बाद में नौकरी छोड़कर राजनीति में कूदीं और अपने शहर की मेयर बनीं.

सुगाता किताब में लिखते हैं, “हालांकि सुभाष और एमिली ने अपनी शादी को लेकर सार्वजनिक तौर पर कभी कुछ नहीं कहा लेकिन शायद लगता है कि दोनों में ये सहमति थी कि इस शादी को भारत की आजादी के बाद ही उजागर किया जाएगा.”

1994 में एक इतिहासकार ने सुगाता बोस को 166 पत्र सौंपे, जो सुभाष ने एमिली को लिखे थे. बाद में कुछ पत्र एमिली ने उन्हें दिए. एमिली द्वारा सुभाष को लिखे कई पत्र बोस परिवार को तब मिले, जब वो कोलकाता के उस मकान  सफाई कर रहे थे, जिसमें सुभाष रहा करते थे.

सुभाष ने जिस तरह से रोमांटिक, गहरी भावनाओं से युक्त पत्र एमिली को लिखे, उससे जाहिर है कि दोनों एक दूसरे को जबरदस्त प्यार करते थे. ये भी समझा जा सकता है कि दोनों ने व्यक्तिगत स्तर पर बहुत बड़ा समझौता किया. नेताजी का पहला प्यार उनका अपना देश था और उसका स्वतंत्रता संग्राम था. एमिली कभी इसमें आड़े नहीं आईं.

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