Pakistan News: सोवियत संघ के खिलाफ बना NATO टूट रहा है. वहीं मजहब के नाम पर बने एक और NATO का विस्तार हो रहा है. पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने सऊदी अरब के साथ मिलकर इस्लामिक नाटो बनाने की जो शुरुआत की, अब उसमें तुर्किए की भी एंट्री होने वाली है.
तुर्किये पाकिस्तान की तरह ही कट्टर इस्लामिक और भारत विरोधी मुल्क है. तुर्किए के इस गठबंधन में शामिल होने से कैसे मिडिल ईस्ट, यूरोप और दक्षिण एशिया में शक्ति का संतुलन बदल सकता है और इसे भारत के लिहाज से कितना बड़ा खतरा माना जाए..इसे समझने की जरूरत है.
आखिरी चरण में है वार्ता
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी अरब और पाकिस्तान के इस्लामिक नाटो में शामिल होने के लिए तुर्किए की बातचीत अंतिम चरण में है. तुर्किए जल्द ही इस समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है. तुर्किए के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक सऊदी अरब और तुर्किए के बीच इसी हफ्ते एक सैन्य बैठक भी हुई है. तुर्किए वो देश है जो असली नाटो में भी है. लेकिन नाटो में तुर्किए की हैसियत बहुत छोटी है. इसी वजह से ताकत के भूखे और मुस्लिम देशों का सबसे बड़ा खलीफा बनने का ख्वाब देख रहे एर्दोआन इस्लामिक नाटो बनाकर उसकी कमान संभालने की फिराक में हैं.
हमले का मिलकर देंगे जवाब
तीनों देशों के बीच समझौता नाटो के अनुच्छेद 5 की तर्ज पर होगा. नाटो के अनुच्छेद 5 के मुताबिक किसी एक देश पर हमले को नाटो के सभी 32 देशों पर हमला माना जाता है और सभी देश मिलकर उसका जवाब देते हैं. यानी तुर्किए अगर इस्लामिक नाटो में शामिल हुआ तो पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में वो पाकिस्तान का साथ देगा.
इस इस्लामिक नाटो की शुरुआत पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच समझौते से हुई थी. पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. स्ट्रैटजिक म्युचुअल डिफेंस एग्रीमेंट के तहत ये तय किया गया कि किसी एक देश पर हमले को दोनों के खिलाफ हमला माना जाएगा.
#DNAमित्रों | पाकिस्तान पर हमला होगा तो तुर्किये जंग लड़ेगा...'इस्लामिक NATO' को हाईजैक करेगा 'खलीफा'!#DNA #DNAWithRahulSinha #Pakistan #IslamicNATO #Turkey@RahulSinhaTV pic.twitter.com/bouFxxA80n
— Zee News (@ZeeNews) January 10, 2026
भारत के लिए कैसे बदलेंगे समीकरण?
आपको ये भी जानना चाहिए कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के इस्लामिक नाटो में तुर्किए के शामिल होने पर क्या असर पड़ेगा. भारत के लिए समीकरण कैसे बदलेंगे. लेकिन उससे पहले तीनों देशों की क्षमता के बारे में जानना जरूरी है. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए इस्लामिक दुनिया की 3 बड़ी ताकतें हैं.
पाकिस्तान जहां परमाणु शक्ति से संपन्न देश हैं, वहीं तुर्किए हथियारों की तकनीक के मामले में मज़बूत है. सऊदी अरब आर्थिक शक्ति माना जाता है. यानी तीनों देश का गठबंधन बन जाने के बाद मिडिल ईस्ट, दक्षिण एशिया और वैश्विक सुरक्षा में नया युग शुरू हो सकता है. इसमें परमाणु शक्ति, आर्थिक शक्ति और तकनीकी शक्ति का मेल होगा.
कितनी होगी गठबंधन की ताकत
आपको ये भी जानना चाहिए कि अगर वास्तव में तुर्किए इस समझौते में शामिल होता है तो सैन्य शक्ति के मामले में ये कितना बड़ा गठबंधन होगा.
ग्लोबल फायर पावर की रैंकिंग में तुर्किए 9वें स्थान पर है जबकि पाकिस्तान 12वें और सऊदी अरब 24वें स्थान पर है. तीनों को मिला दें तो अनुमानित सैन्य ताक़त में ये गठबंधन टॉप 5 से 7 स्थान पर होगा.
तुर्किए का रक्षा बजट 47 अरब डॉलर है जबकि पाकिस्तान का 9 अरब डॉलर और सऊदी अरब का 75 अरब डॉलर. यानी तीनों का संयुक्त रक्षा बजट 130 अरब डॉलर से ज़्यादा होगा जो दुनिया में टॉप 3 में होगा.
सैनिकों की संख्या की बात करें तो तुर्किए के पास लगभग 4 लाख सैनिक हैं जबकि पाकिस्तान के पास 6.5 लाख और सऊदी अरब के पास 2.5 लाख. यानी कुल मिलाकर 13 लाख सैनिक होंगे जो दुनिया में टॉप 3 में होगा.
हवाई शक्ति की बात करें तो तुर्किए के पास लगभग 200 लड़ाकू विमान हैं जबकि पाकिस्तान के पास 400 और सऊदी अरब के पास 300. यानी कुल मिलाकर लगभग 900 फाइटर प्लेन हैं. इस तरह ये गठबंधन तीसरे नंबर पर होगा.
इस तरह तीनों देशों की संयुक्त ताकत दुनिया में टॉप 5 में हो सकती है. सैन्य ताकत में मजबूती के साथ ये गठबंधन सुन्नी देशों की एकजुटता बढ़ाएगा. इसका असर न सिर्फ़ भारत और इज़रायल पर पड़ेगा बल्कि ईरान के लिए भी ये ख़तरा साबित हो सकता है.
अलग-अलग देशों पर प्रभाव की बात करें तो पाकिस्तान को सऊदी अरब से पैसा और तुर्किए से हथियार मिलेगा तो भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ेगा. भारत के लिए ये गठबंधन एक रणनीतिक चुनौती है. इससे इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर प्रोजेक्ट पर भी असर पड़ सकता है.
इजरायल के लिए भी ये गठबंधन चिंता की बात है. गठबंधन बना तो मिडिल ईस्ट में इजरायल के दबदबे को सीधी चुनौती मिलेगी.
ईरान के लिए भी ये गठबंधन बड़ी चुनौती बनेगा क्योंकि सऊदी अरब और ईरान के संबंध अच्छे नहीं हैं. सऊदी अरब इस गठबंधन के सहारे ईरान समर्थक हूती और हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों को रोक सकता है.
अमेरिका-नाटो के लिए बुरी खबर
अमेरिका और नाटो के प्रभाव के लिए भी ये गठबंधन शुभ संकेत नहीं है. लेकिन इससे तुर्किए के खिलाफ पश्चिमी देशों में माहौल बनेगा. तुर्किए को पश्चिमी देश विश्वसनीय सहयोगी के रूप में नहीं देखेंगे.
इस्लामिक नाटो का एक सच ये भी है कि समझौता हो जाने के बाद भी इनके बीच नाटो जैसा तालमेल नहीं बन पाया है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच नाटो जैसा समझौता पहले से है. लेकिन इसके बावजूद अफगानिस्तान के साथ टकराव के दौरान सऊदी अरब, पाकिस्तान की मदद के लिए आगे नहीं आया.
समझौते के मुताबिक सऊदी अरब को पाकिस्तान पर हमले को ख़ुद पर हमले की तरह मानना चाहिए था. उसे अफगानिस्तान को जवाब देना चाहिए था. लेकिन वो जवाब देने के बदले दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कराता रहा. यानी इस्लामिक नाटो बनाने के प्लान की पहले ही पोल खुल चुकी है.
तुर्किए-सऊदी रहे हैं एक दूसरे के विरोधी
आपको ये भी पता होना चाहिए कि सऊदी अरब और तुर्किए के बीच संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव आता रहा है. भले ही हाल के वर्षों में तुर्किए और सऊदी अरब के बीच संबंधों में सुधार हुआ है
लेकिन दोनों देश पारंपरिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं. मुस्लिम वर्ल्ड का खलीफा बनने के लिए दोनों देशों के बीच मुकाबले का लंबा इतिहास रहा है. कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी बना हुआ है. ऐसे में इस गठबंधन को बहुत भरोसेमंद बताना जल्दबाजी होगी.
भारत से टक्कर हुई तो क्या होगा?
नाटो की तर्ज पर इस्लामिक गठबंधन बनता है तो उसका असर वैसे तो पूरी दुनिया पर होगा. लेकिन इन देशों के निशाने पर सबसे ज़्यादा भारत और इजरायल होंगे. हम आपको तीनों देशों की संयुक्त ताकत़ के बारे में बता चुके हैं. लेकिन अगर भारत और इस्लामिक नाटो के बीच टक्कर हुई तो क्या होगा। इसे आंकड़ों के जरिए समझते हैं.
ग्लोबल फायर पावर की रैंकिंग में इस्लामिक नेटो के तीनों देशों को मिलाकर 5 से लेकर 7वीं रैंकिंग होगी जबकि भारत की रैंकिंग चौथी है.
इस्लामिक नाटो का रक्षा बजट 131 अरब डॉलर का होगा जबकि भारत का रक्षा बजट 81 अरब डॉलर है.
इस्लामिक नाटो के सैनिकों की संख्या 13 लाख होगी जबकि भारत के पास 14 लाख से ज्यादा सैनिक हैं. यानी पाकिस्तान-तुर्किये और सऊदी अरब को मिलाकर जितने सैनिक हैं, उससे ज्यादा सैनिक अकेले भारत के पास हैं.
इस्लामिक नाटो के पास 6,000 टैंक हैं जबकि भारत के पास 4,600.
लड़ाकू विमान की बात करें तो इस्लामिक नाटो के पास 900 फाइटर जेट हैं और भारत के पास लगभग 500.
यानी तीनों इस्लामिक ताकतों के मिल जाने के बाद भी भारत मुकाबला करने में सक्षम है. हालांकि कुछ मामलों में इस्लामिक नाटो ज्यादा मजबूत दिखता है. इसी वजह से सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या भारत को भी अपना नाटो बनाने की जरूरत आ गई है. वैसे तो भारत गुटनिरपेक्ष देश रहा है, लेकिन इस्लामिक नाटो का जवाब देने के लिए भारत भी उन क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है जो तुर्किए के लिए संवेदनशील माने जाते हैं.
तुर्किए का जवाब देने के लिए ग्रीस और साइप्रस जैसे तुर्किए के विरोधियों से भारत अपने संबंध लगातार आगे बढ़ा रहा है. दूसरी तरफ इजरायल ने सीरिया में तुर्किए विरोधी SDF और ड्रूज मिलिशिया को मदद देनी शुरू कर दी है. ऐसे कदमों का एक ही लक्ष्य है. अगर इस्लामिक दुनिया का खलीफा कहे जाने वाला तुर्किए दूसरे देशों को चुनौती दे तो उसके पड़ोस में पहले से ही एक बड़ी सामरिक चुनौती मौजूद रहे.

12 hours ago
