Trump Vs Europe: अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन और ईरान जैसे देशों में जो घटनाएं हो रही हैं, उसका असर आप पर कैसे पड़ने वाला है. दुनिया में पावर शिफ्टिंग की इस प्रक्रिया में आगे क्या क्या होने वाला है और एक एक घटना किस तरह सीधे आपके जीवन को प्रभावित करेगी.यह आपको जानना चाहिए. दुनिया में पावर शिफ्टिंग की प्रक्रिया में जो दोस्त थे वो कैसे दुश्मन बनते जा रहे हैं. दुनिया के सबसे बड़े सैन्य गठबंधन नेटो में दरार क्यों पड़ गई है और कल तक जो अमेरिका यूरोप का रखवाला बन रहा था. आज वही अमेरिका यूरोपीय देशों को खतरा क्यों लग रहा है.
यूरोप करेगा रूस से बात!
जिस रूस को यूरोप सबसे बड़ा दुश्मन समझता था, आज इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों उसी रूस से बातचीत की नसीहत क्यों दे रहे हैं. पावर शिफ्टिंग की इस प्रक्रिया में अमेरिका रूस को धमका रहा है और चीन अमेरिका को धमकी दे रहा है. मिडिल ईस्ट में एक खलीफा दूसरे खलीफा का दुश्मन बन गया है और कट्टर मुस्लिम देश अपने कट्टर दुश्मन इजरायल की मदद करने वाले कदम उठा रहे है. और दुनिया में हो रही ये सारी घटनाएं आपके लिए सिर्फ खबर नहीं है. ये सीधे आपके घर पर असर डालने वाली घटनाएं हैं. इस पावर शिफ्टिंग के असर को समझकर भारत के निम्न मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग दोनों को भविष्य की योजनाएं बनानी होंगी.
अमेरिका ने बढ़ा दी यूरोप की टेंशन
इस पावर शिफ्टिंग में सबसे पहले बात अमेरिका और यूरोप के रिश्तों की करते हैं क्योंकि बदलते समीकरणो में सबसे ज्यादा बदलाव इन्हीं रिश्तों पर पड़ रहा है. दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन नेटो के 32 देशों में 31 एक तरफ खड़े हैं और सबसे ताकतवर अमेरिका दूसरी तरफ खड़ा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अब यूरोपीय देशों को धमका रहे हैं, उनको समझा रहे हैं उनका सबसे बड़ा दुश्मन रूस नेटो से नहीं डरता सिर्फ अमेरिका से डरता है.
डॉनल्ड ट्रंप यूरोप को रूस का डर दिखा रहे हैं.यूरोप को समझा रहे हैं. अगर अमेरिका नहीं होगा तो रूस पूरे यूरोप की ईंट से ईंट बजा देगा. पहले यूक्रेन पर कब्जा करेगा फिर दूसरे देशों को निशाना बनाएगा. आपको यूरोप को इस नसीहत के पीछे ट्रंप की मंशा के बारे में भी जानना चाहिए.ऐसा करके अमेरिका के राष्ट्रपति यूरोप को समझा रहे हैं, जिस चीज की उनको जरूरत है उसे सौंप दिया जाए. यानी ग्रीनलैंड अमेरिका को दे दिया जाए. डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने अपनी सेना को आर्डर दिए हैं कि ग्रीनलैंड पर हमला करने वालों को पहले गोली मारें फिर किसी सवाल का जवाब दें.
ट्रंप ने बताई ग्रीनलैंड पर कब्जे की वजह
कई यूरोपीय देशों को डेनमार्क की प्रधानमंत्री की बात बहुत अच्छी लगी थी. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड और स्पेन के नेताओं ने डेनमार्क के साथ मिलकर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का बचाव किया था. लेकिन अब डॉनल्ड ट्रंप ने यूरोप को धमकाया है.अमेरिका के बगैर यूरोपीय देश अपनी रक्षा नहीं कर सकते.डॉनल्ड ट्रंप ने सारे यूरोप को बता दिया है कि वो ग्रीनलैंड पर कब्जा जरूर करेंगे.ट्रंप ने इसकी वजह भी बताई है.
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— Zee News (@ZeeNews) January 10, 2026
ट्रंप ने कह दिया ग्रीनलैंड को प्यार से दे दो नहीं तो अमेरिका ताकत से छीन लेगा. ट्रंप यूरोपीय देशों का अपमान करते हुए कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का तो नहीं रहने वाला क्योंकि अमेरिका ने इसको नहीं लिया तो चीन और रूस ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेंगे. मतलब समझ रहे हैं आप.ट्रंप अपने सहयोगियों को समझा रहे हैं कि बगैर अमेरिका यूरोपीय देशों का कोई वजूद नहीं और वो सिर्फ अमेरिका की कृपा से जी रहे हैं. ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए अमेरिका साम-दाम-दंड और भेद चारों उपायों का इस्तेमाल करने के लिए तैयार हैं. ऐसे में यूरोप के सामने सिर्फ दो विकल्प बचते हैं.
पहला विकल्प-अमेरिका के सामने सरेंडर कर दे यानी ग्रीनलैंड अमेरिका को दे दे.
दूसरा विकल्प - अमेरिका के अलावा नेटो में शामिल सभी यूरोपीय देश एकजुट होकर ग्रीनलैंड को बचाएं.
दोस्तों के खिलाफ खड़े हुए ट्रंप
यूरोप ने पहला विकल्प चुना तो अमेरिका का फायदा है लेकिन दूसरा विकल्प चुना तो कल तक दोस्त रहे अमेरिका और यूरोप आमने सामने होंगे. यानी अमेरिका और यूरोप में युद्ध होगा और ट्रंप की नीतियों ने अब यूरोपीय नेताओं को दूसरे विकल्पों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है. अब यूरोपीय देश रक्षा ऊर्जा किसी भी क्षेत्र में पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहते. इसीलिए पहले फ्रांस ने रूस से बात करने के संकेत दिए थे और अब ट्रंप की करीबी मानी जाने वाली इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने यूरोपीय देशों को रूस से बातचीत करने की सलाह दी है. इन बयानों को यूरोप की नीतियों में आ रहे परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा है.
इटली की प्रधानमंत्री ने कहा, 'मेरा मानना है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सही हैं. अब वह समय आ गया है जब यूरोप को रूस से भी बातचीत करनी चाहिए. अगर यूरोप शांति वार्ताओं में केवल एक पक्ष से बात करेगा, तो उसकी भूमिका सीमित रह जाएगी और हम सकारात्मक योगदान नहीं दे पाएंगे. शांति तभी संभव है जब दोनों पक्षों से संवाद हो.'
मेलोनी ने क्या कहा?
इसके अलावा मेलोनी ने साफ साफ कहा कि यूरोपीय संघ को रूस के साथ सीधी बातचीत के लिए एक नेता या दूत नियुक्त करना चाहिए. इसका मतलब समझ रहे हैं आप अब यूरोप अमेरिका के इशारे पर पुतिन से बात नहीं करना चाहता.सीधे पुतिन से डील करना चाहता है और ये सलाह वो जॉर्जिया मेलोनी दे रही हैं.जो यूरोप में ट्रंप की सबसे करीबी मानी जाती हैं. इससे पहले जॉर्जिया मेलोनी ने अमेरिका की उस योजना पर भी आश्चर्य व्यक्त किया था, जिसमें ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए मिलिट्री के इस्तेमाल की बात कही गई थी. यानी साफ है कि ग्रीनलैंड प्रकरण के बाद यूरोप अमेरिका को विश्वसनीय सहयोगी नहीं मान रहा है. इससे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी यूरोपीय देशों को रूस के और करीब जाने की सलाह दे चुके हैं.
रूस से दुश्मनी का यूरोप को हो रहा नुकसान
मतलब अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर हमला करता है तो यूरोपीय देश रूस के करीब जाने का विकल्प भी तलाश कर रहे हैं. आज आपको ये भी जानना चाहिए रूस से दुश्मनी से यूरोप का कितना नुकसान हो रहा है और रूस से दोस्ती यूरोप के लिए कितनी फायदेमंद है.
पहले यूरोपीय देश रूस से 40% गैस खरीदते थे.जर्मनी जैसे देश तो अपने इस्तेमाल की 55% गैस रूस से लेते थे. लेकिन रूस यूक्रेन वॉर के बाद रूस की सस्ती गैस की बजाय यूरोप को अमेरिका से महंगी गैस खरीदनी पड़ी, जिससे यूरोपीय देशों में गैस की कीमत 5–7 गुना बढ़ गई.
इससे जर्मनी, फ्रांस, इटली और इटली जैसी बड़ी इकोनॉमी वाले देशों के कारखानों में प्रोडक्शन धीमा हो गया.महंगाई में 10% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई.
अब तक यूरोप को इसकी वजह से 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो चुका है.
पहले यूरोप, रूस से गेहूं और उर्वरक खरीदता था लेकिन अब यूरोपीय देश सिर्फ यूक्रेन से गेहूं लेते हैं, जिसका निर्यात हमलों और रास्ता रोकने की वजह से बाधित होता रहता है.
वहीं मिस्र,अल्जीरिया, कनाडा और अमेरिका से गेहूं और उर्वरक मंगाना महंगा है.इससे यूरोपीय देशों में खाद्य महंगाई 20 से 30% तक बढ़ी है. इससे किसानों की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है.
सरकारों को किसानों को सब्सिडी देनी पड़ी है, जिससे यूरोपीय देशों का खजाना खाली हुआ है.
इसके अलावा रूस से व्यापार बंद होने से यूरोप की निर्भरता अमेरिका और मिडिल ईस्ट पर बढ़ी है. यानी यूरोप की रणनीतिक स्वतंत्रता कमजोर हुई है.
अमेरिका यूरोप भिड़े तो भारत का भी नुकसान
अब यूरोप को रूस से लड़वाने के बाद अमेरिका तेवर दिखा रहा है तो यूरोपीय देशों को फिर से रूस की याद आ रही है. आपने देखा युद्ध से यूरोप का कितना नुकसान हुआ. लेकिन अगर ग्रीनलैंड पर अगर यूरोप और अमेरिका भिड़ते हैं तो नुकसान सिर्फ अमेरिका या यूरोप का नहीं होगा. भारत का भी होगा, आपका भी होगा और इसके लिए आपको आगे क्या क्या करना है. चलिए आपको बताते हैं.
दुनिया में यूरोप और अमेरिका के संघर्ष की आशंका अभी अभी पनपी है. लेकिन अमेरिका और चीन के बीच कई क्षेत्रों में संघर्ष चल रहा है, जो किसी भी वक्त युद्ध में बदल सकता है. अमेरिका, वेनेजुएला,ताइवान और ग्रीनलैंड से लेकर कई हिस्सों में चीन के हित के सामने खड़ा है.

12 hours ago
