Last Updated:February 15, 2026, 05:11 IST
Air Defence System: आकाश-एनजी एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम साफ कह रहा है कि भारत अब आसमान में बचाव नहीं करता, वह दुश्मन की प्लानिंग को वहीं खत्म कर देता है. यह भारत की एयर डिफेंस क्षमता का अगला निर्णायक कदम है, जिसे आधुनिक युद्ध की असलियत को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है.

नई दिल्ली. भारत की एयर डिफेंस अब सिर्फ दूरी और सटीकता की कहानी नहीं रही, यह अब दबाव में टिके रहने, झुंड में आते हमलों को तोड़ने और इलेक्ट्रॉनिक जंग में ज़िंदा रहने की लड़ाई बन चुकी है. और इसी नए युद्ध युग में डीआरडीओ का ‘आकाश नेक्स्ट जेनरेशन डिफेंस सिस्टम’ एक साफ़ संदेश दे रहा है कि भारत अब आसमान में रिएक्ट नहीं करता, पहले काउंटर करता है. आधुनिक युद्ध में दुश्मन अब एक मिसाइल नहीं भेजता. वह भेजता है ड्रोन स्वार्म, क्रूज़ मिसाइल्स, लो-ऑब्ज़र्वेबल टारगेट्स और साथ में जैमर्स. Akash-NG को ठीक इसी हकीकत के लिए गढ़ा गया है. यह सिस्टम अब सैचुरेशन अटैक सर्वाइवर है. मतलब एक साथ कई दिशाओं से आने वाले हमलों को देखना, ट्रैक करना और उसे मार गिराना.
भारतीय वायुसेना की ताकत में एक ऐसा अध्याय जुड़ गया है जो दुश्मनों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है. हम बात कर रहे हैं आकाश-एनजी (Akash-NG) यानी ‘नेक्स्ट जनरेशन’ की. यह पुराना आकाश नहीं है; यह एक नई नस्ल का शिकारी है. डीआरडीओ ने इसे सिर्फ डिफेंस के लिए नहीं, बल्कि डोमिनेंस के लिए तैयार किया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका नया इंजन और ‘ब्रेन’ है, जो इसे पलक झपकते ही मौत का पैगाम देने वाला हथियार बनाता है.
1. रैमजेट गया, अब ‘ड्यूल-पल्स’ का राज: रफ्तार बनी हथियार
पुराने आकाश सिस्टम से सबसे बड़ा बदलाव इसके दिल यानी इंजन में किया गया है. आकाश-NG ने पुराने रैमजेट तकनीक को अलविदा कह दिया है और अपनाया है ‘ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर’. लॉन्च होते ही यह मिसाइल भयानक एक्सीलरेशन लेती है. ड्यूल-पल्स का मतलब है कि जब मिसाइल टारगेट के करीब पहुंचती है, तब इसके पास जबरदस्त एनर्जी रिजर्व रहती है, जिससे यह हाई-जी टर्न लेकर भागते हुए दुश्मन को भी दबोच लेती है. यह सिस्टम वजन में हल्का है, इसका फुटप्रिंट छोटा है, जो इसे मारो और भागो की बेजोड़ क्षमता देता है. यानी मिसाइल फायर करके यूनिट वहां से तुरंत गायब हो सकती है, ताकि दुश्मन पलटवार न कर सके.
2. ‘100 पर नजर, 10 पर प्रहार’: कोई नहीं बच सकता
आकाश-NG का सेंसर सूट आधुनिक ‘नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर’ के लिए डिजाइन किया गया है. इसमें लगा एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड एरे (AESA) मल्टीफंक्शन रडार एक साथ 100 से ज्यादा हवाई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है. यह सिस्टम सिर्फ देखता नहीं है, बल्कि एक ही समय में 10 अलग-अलग टारगेट्स को एंगेज करके उन्हें तबाह कर सकता है. चाहे वह लो-आरसीएस (Low-RCS) वाले ड्रोन हों या क्रूज मिसाइलें, अब वे रडार को चकमा देकर भारतीय सीमा में घुसने का खेल नहीं खेल सकते.
3. जैमिंग का तोड़: इलेक्ट्रॉनिक जंग का बाहुबली
आज के दौर में दुश्मन मिसाइलों को रास्ते से भटकाने के लिए जैमिंग का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन आकाश-NG ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है. इसमें रेडियो फ्रीक्वेंसी की जगह ऑप्टिकल प्रॉक्सिमिटी फ्यूज़ का इस्तेमाल किया गया है. इसका मतलब है कि दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स और डिकॉय इस मिसाइल को अंधा नहीं कर सकते. यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस से लगभग अछूता है और टारगेट के पास पहुंचते ही सटीक धमाका करता है. यह लैब के लिए नहीं, असली युद्धभूमि के शोर के लिए बना है.
4. अब यह ‘स्थिर’ नहीं, ‘मोबाइल हंटर’ है
सिर्फ मिसाइल ही नहीं, इसका लॉन्चर भी बेहद आक्रामक है. यह 360 डिग्री एजीमुथ (Azimuth) कवरेज देता है, यानी हमला किसी भी दिशा से हो, जवाब तुरंत मिलेगा. आकाश-NG को तैनात होने में सिर्फ 20 मिनट लगते हैं. और एक बार फायर करने के बाद, इसे दोबारा लोड (Re-load) करने में 10 मिनट से भी कम समय लगता है. आकाश-NG के आने से भारतीय एयर डिफेंस यूनिट्स अब एक जगह स्थिर रहने वाले टारगेट नहीं, बल्कि ‘मोबाइल हंटर्स’ बन गई हैं. यह सिस्टम बताता है कि भारत अब मिसाइल तकनीक में दुनिया के किसी भी देश से पीछे नहीं है.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h...और पढ़ें
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New Delhi,Delhi
First Published :
February 15, 2026, 05:11 IST

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