Last Updated:March 13, 2026, 13:55 IST
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अगर इस तरह के अवकाश को कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया, तो नियोक्ता (Employers) महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लगेंगे, जिससे अनजाने में महिलाओं के करियर और उनके खिलाफ लैंगिक रूढ़ियों (Gender Stereotypes) को ही बढ़ावा मिलेगा.

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं एवं कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश देने संबंधी राष्ट्रव्यापी नीति निर्माण का अनुरोध करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से शुक्रवार को इनकार करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में कोई महिलाओं को नौकरी नहीं देगा और ऐसा प्रावधान लैंगिक रूढ़ियों को अनजाने में और मजबूत करेगा. शीर्ष अदालत ने हालांकि कहा कि सक्षम प्राधिकारी इस संबंध में दिए गए अभ्यावेदन पर विचार कर सकते हैं और सभी संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद मासिक धर्म अवकाश पर नीति बनाने की संभावना की समीक्षा कर सकते हैं. न्यायालय ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अभ्यावेदन पर उचित निर्णय लें.
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, “ऐसी याचिकाएं डर पैदा करने के लिए दायर की जाती हैं, ये महिलाओं को हीन बताने के लिए, यह कहने के लिए दायर की जाती हैं कि मासिक धर्म उनके साथ होने वाली कोई बुरी चीज है.. लेकिन उस नियोक्ता के बारे में सोचिए, जिसे सवेतन अवकाश देना होगा.” पीठ ने शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.
भारत के प्रधान न्यायाधीश ने मासिक धर्म अवकाश को कानून के जरिये अनिवार्य किए जाने के संभावित सामाजिक परिणामों को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाएं महिलाओं के बारे में रूढ़ीवादी धारणाओं को अनजाने में और मजबूत कर सकती हैं. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम आर शमशाद ने कहा कि कुछ राज्यों और संस्थानों ने मासिक धर्म अवकाश के अनुरूप पहले ही कदम उठाए हैं. उन्होंने केरल का उदाहरण दिया, जहां विद्यालयों में इस संबंध में छूट दी गई है. उन्होंने कहा कि कई निजी कंपनियों ने भी कर्मचारियों को स्वेच्छा से इस प्रकार का अवकाश दिया है.
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने इस पर कहा कि स्वैच्छिक नीतियां स्वागतयोग्य हैं लेकिन उन्होंने ऐसे प्रावधानों को कानून के जरिये अनिवार्य बनाए जाने के प्रति आगाह किया. उन्होंने कहा, “स्वेच्छा से अवकाश दिया जाना बहुत अच्छी बात है लेकिन जैसे ही आप कहेंगे कि यह कानून के तहत अनिवार्य है तो कोई उन्हें नौकरी नहीं देगा. उन्हें न्यायपालिका या सरकारी नौकरियों में कोई नहीं लेगा; उनका करियर खत्म हो जाएगा.” पीठ ने ऐसी व्यवस्थाओं के कार्यस्थल पर प्रभाव और महिलाओं की पेशेवर प्रगति पर पड़ने वाले संभावित असर को भी रेखांकित किया. पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर गौर करते हुए कहा कि याचिका दायर करने वाला व्यक्ति संबंधित प्राधिकारियों को पहले ही अभ्यावेदन दे चुका है.
About the Author
राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h...और पढ़ें
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
March 13, 2026, 13:54 IST

1 hour ago
