Last Updated:March 11, 2026, 11:12 IST
भारत में दवाओं की कीमतें जल्द बढ़ सकती हैं. इसका कारण कुछ और नहीं, बल्कि ईरान में चल रही जंग है. दवा मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API) और सॉल्वेंट्स की कीमतें पिछले दो हफ्तों में करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. युद्ध के कारण शिपिंग का संकट पैदा हो गया है, जिससे चीन से आने वाले कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है.

नई दिल्ली. ईरान पर इज़रायल और अमेरिकी हमलों के चलते पूरी दुनिया के सामने तेल और गैस का संकट तो है ही, अब एक और जानकारी सामने आई है कि आने वाले दिनों में दवाओं के दाम भी बढ़ सकते हैं. हाल के दिनों में दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है. पिछले दो हफ्तों में इनकी लागत करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जिससे भारत की फार्मा इंडस्ट्री पर भारी दबाव बन गया है.
एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API) से ही दवाएं बनती हैं. इनकी कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह ईरान युद्ध के बाद पैदा हुआ शिपिंग संकट बताया जा रहा है. कंटेनर जहाजों की कमी के कारण चीन से भारत आने वाले कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हो रही है. चीन भारतीय दवा कंपनियों के लिए एपीआई का सबसे बड़े सप्लायरों में से एक है. ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ दवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी की आशंका है. इसके अलावा शिपिंग लागत भी तेजी से बढ़ी है. प्रति शिपमेंट माल ढुलाई पर लगने वाला शुल्क दोगुना होने के साथ-साथ 4,000 से 8,000 डॉलर तक के अतिरिक्त सरचार्ज भी वसूले जा रहे हैं.
दवा बनाने की लागत में वृद्धि
इकॉनमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फार्मा इंडस्ट्री से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया है कि आयात करने वाली कंपनियां कच्चे माल की बढ़ी कीमतों का बोझ सीधे दवा कंपनियों पर डालने लगी हैं. इंडस्ट्री से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि API की कीमतें बढ़ने के साथ-साथ फार्मास्युटिकल सॉल्वेंट्स की लागत भी 20–30% तक बढ़ चुकी है, जबकि शिपिंग कंपनियां भी अतिरिक्त शुल्क वसूल रही हैं. ऐसे में आयातकों के पास अतिरिक्त लागत को खुद वहन करने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है.
इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, कई अहम कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल आया है. जैसे कि ग्लिसरीन की कीमत दिसंबर के मुकाबले करीब 64 फीसदी तक बढ़ चुकी है, जबकि पैरासिटामोल की कीमत में लगभग 26 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है.
दवा बनाने में पेट्रोकेमिकल्स का क्या काम?
फार्मा इंडस्ट्री विशेषज्ञ मेहुल शाह का कहना है कि फार्मास्युटिकल सॉल्वेंट्स पेट्रोकेमिकल्स से बनते हैं और मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है. इससे इन सॉल्वेंट्स की कीमतें सिर्फ एक सप्ताह में काफी बढ़ गई हैं. चूंकि यह दवा उत्पादन का सीधा इनपुट है, इसलिए इससे मैन्युफैक्चरिंग की लागत तेजी से बढ़ रही है और इसका असर अब दवा कंपनियों पर दिखाई देने लगा है.
कीमतें बढ़ाने की मांग कर रही इंडस्ट्री
फार्मा इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो स्थिति और गंभीर हो सकती है. इसी वजह से इंडस्ट्री के भीतर से सरकार से दवाओं की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की अनुमति देने की मांग उठने लगी है.
फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश जैन का कहना है कि फार्मा इंडस्ट्री पर पहले से ही कड़ी मूल्य नियंत्रण व्यवस्था लागू है. ऐसे में कच्चे माल की कीमतों में इतनी वृद्धि को कंपनियों के लिए अपने स्तर पर संभालना मुश्किल हो रहा है. उनका मानना है कि नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी इस स्थिति को देखते हुए विशेष अनुमति के तहत दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की मंजूरी दे.
शिपिंग संकट से आपूर्ति पर भी खतरा
फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष दिनेश दुआ का कहना है कि ईरान युद्ध के कारण वैश्विक शिपिंग रूट प्रभावित हो रहे हैं और माल ढुलाई की लागत तेजी से बढ़ रही है. अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो इसका असर जरूरी दवाओं की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है.
इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर दवा कंपनियां उत्पादन दक्षता बनाए रखने के लिए “जस्ट-इन-टाइम” इन्वेंट्री मॉडल अपनाती हैं, यानी वे बहुत ज्यादा स्टॉक नहीं रखतीं. लेकिन अगर युद्ध अगले 10–15 दिनों तक जारी रहता है तो यह रणनीति कंपनियों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है क्योंकि कच्चे माल की आपूर्ति में पहले से ही देरी हो रही है.
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मलखान सिंह पिछले 17 वर्षों से ख़बरों और कॉन्टेंट की दुनिया में हैं. प्रिंट मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई नामी संस्थानों का नाम प्रोफाइल में जुड़ा है. लगभग 4 साल से News18Hindi के साथ काम कर रहे ...और पढ़ें
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First Published :
March 11, 2026, 11:10 IST

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