Last Updated:March 15, 2026, 13:33 IST
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और भारत के रिश्ते हमेशा से ही जटिलताओं और गहरी कूटनीति से भरे रहे हैं. एक ओर जहां खामेनेई का भारत से गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव था, वहीं दूसरी ओर कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान का रुख कभी भारत के पक्ष में रहा तो कभी पाकिस्तान की ओर झुका दिखा. आइए जानते हैं भारत-ईरान संबंधों के उन पन्नों को, जो आज भी कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं.

इतिहास गवाही दे रहा है कि भारत और ईरान के रिश्ते हजारों साल पुराने हैं. बीते कुछ वर्षों में भारत और ईरान कई मायने में एक दूसरे के नजदीक भी रहे और कुछ मुद्दों पर दूरी भी रही. इसके बावजूद ईरान के साथ भारत के रिश्ते में कभी भी पाकिस्तान आड़े नहीं आया. ईरान-इजरायल युद्ध में ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. खामेनेई की मौत पर भारत में कुछ मुस्लिम संगठनों और राजनीतिक दलों ने शोक जाताया. जानकारों की मानें तो अली खामेनेई का भारत से रिश्ता केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि पुश्तैनी भी था. बहुत कम लोग जानते हैं कि खामेनेई के पूर्वज उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से ताल्लुक रखते थे, जो बाद में ईरान के खामेनेह शहर में बस गए. इसी वजह से उन्हें भारत के प्रति एक स्वाभाविक लगाव था. लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता के भारत में प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने एक इंटरव्यू में जो दावे किए हैं, वह बता रहा है कि ईरान का भारत के साथ रिश्ता कितना पुराना और मजबूत था.
भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा है कि हमारे पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई भारत के साथ गहरे संबंधों के पक्षधर थे. वह भारत से प्रेम करते थे. उन्होंने दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और दीर्घकालिक संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि ईरान, भारत के साथ संबंधों में कोई संघर्ष या समस्या नहीं चाहता. उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच भारतीय पोतों को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जाएगी. उन्होंने कहा कि ईरान और भारत के बीच मित्रता की जड़ें पांच हजार साल से भी अधिक पुरानी हैं. ईरानी लोग संस्कृति, सभ्यता, दर्शन और आध्यात्मिकता के माध्यम से भारतीयों से जुड़े हुए हैं. हमारे दिवंगत सर्वोच्च नेता ने जो पहली किताब लिखी थी, वह भारत के बारे में ही थी.
रिश्तों में गर्मजोशी और कड़वाहट कब-कब आई?
ईरान और भारत का रिश्ता कई बार गर्मजोशी और कई बार कड़वाहट के दौर से गुजरा. ऐतिहासिक रूप से ईरान ने कई मौकों पर भारत का साथ देकर दुनिया को चौंकाया है. 1990 के दशक में जब पाकिस्तान ने मानवाधिकारों के नाम पर संयुक्त राष्ट्र में भारत को कश्मीर मुद्दे पर घेरने की कोशिश की थी, तब ईरान ही वह देश था जिसने वीटो जैसी स्थिति पैदा कर भारत के खिलाफ प्रस्ताव को गिरने दिया. ईरान ने हमेशा अफगानिस्तान में भारत की भूमिका का समर्थन किया और चाबहार पोर्ट के जरिए भारत को मध्य एशिया तक रास्ता देकर पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट की रणनीति को मात दी.
खामेनेई और भारत के बीच कड़वाहट के मोड़
रिश्तों में सबसे बड़ी कड़वाहट तब आई जब भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ में मतदान किया. खामेनेई ने इसे धोखा माना था. इसके बाद, भारत में ‘नुपुर शर्मा विवाद’ के दौरान भी ईरान की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई थी. लेकिन व्यापारिक जरूरतों ने हमेशा इन विवादों को सुलझाने का काम किया.
कश्मीर और पीओके पर ईरान का रुख
हालांकि, ईरान का रुख कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर पर अक्सर डबल गेम जैसा रहा है. आधिकारिक तौर पर ईरान कश्मीर को एक मुस्लिम समुदाय का हिस्सा मानता रहा है. कई बार अयातुल्ला खामेनेई ने अपने भाषणों में कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से की, जिससे भारत सरकार नाराज हुई. पाकिस्तान अक्सर ईरान को इस्लामी भाईचारे के नाम पर भारत के खिलाफ उकसाता रहा है.
इसके बावजूद, ईरान ने कभी भी पीओके को लेकर पाकिस्तान के दावों का उस तरह से खुला समर्थन नहीं किया जैसा तुर्की या कतर करते हैं. ईरान के लिए भारत एक बड़ा ऊर्जा बाजार है, इसलिए उसने हमेशा कश्मीर को एक द्विपक्षीय मुद्दा मानकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की. संयुक्त राष्ट्र में ईरान ने कई बार भारत के खिलाफ मतदान करने से परहेज किया है. जब भारत पर पोखरन परमाणु परीक्षणों के बाद प्रतिबंध लगाने की बात आई, तब ईरान उन चुनिंदा देशों में था जिसने भारत की संप्रभुता का सम्मान किया. हालांकि, हाल के वर्षों में जब भारत ने अमेरिका के दबाव में ईरान से तेल खरीदना बंद किया तो खामेनेई के बयानों में भारत के प्रति थोड़ी कटुता देखी गई थी.
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रविशंकर सिंहचीफ रिपोर्टर
भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले रविशंकर सिंह सहारा समय न्यूज चैनल, तहलका, पी-7 और लाइव इंडिया न्यूज चैनल के अलावा फर्स्टपोस्ट हिंदी डिजिटल साइट में भी काम कर चुके हैं. राजनीतिक खबरों के अलावा...और पढ़ें
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First Published :
March 15, 2026, 13:03 IST

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