Last Updated:March 13, 2026, 11:32 IST
Nizami Sarai: हैदराबाद में निज़ाम काल की नामपल्ली सराय और अन्य मुसाफिरखाने आज भी गरीब मुसाफिरों और मरीजों के परिजनों के लिए किफायती आसरा बने हुए हैं. 1910 में निर्मित ये इमारतें अपनी शानदार वास्तुकला के लिए जानी जाती हैं. लेकिन अब रखरखाव की कमी के कारण ये विरासतें जर्जर हो रही हैं.
Nizami Sarai: तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के चारमीनार की तंग गलियों और नामपल्ली के शोर-शराबे के बीच आज भी कुछ ऐसी ऐतिहासिक इमारतें सीना ताने खड़ी हैं. जिनका इतिहास सदियों पुराना है. निज़ाम काल में निर्मित ये मुसाफिरखाने और सराएँ आज भी उन लोगों के लिए सबसे बड़ा ठिकाना हैं. जिनके पास शहर के महंगे होटलों में रुकने के लिए पैसे नहीं हैं. इन इमारतों की दीवारों में हजारों मुसाफिरों की यादें और शहर की पुरानी तहजीब दफन है. जो आज के आधुनिक दौर में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं.
नामपल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित ‘नामपल्ली सराय’ इंडो-सारासेनिक वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है. इसका निर्माण साल 1910 के आसपास छठे निज़ाम मीर महबूब अली पाशा की याद में करवाया गया था. करीब 39,000 वर्ग फुट के विशाल क्षेत्र में फैली इस इमारत के ऊंचे मेहराब और नक्काशीदार पत्थर के खंभे आज भी अपनी शाही भव्यता की गवाही देते हैं. किसी जमाने में यहाँ केवल शाही मेहमानों के ठहरने का इंतजाम होता था. लेकिन आज इसकी पहचान उन गरीब मुसाफिरों से है जो अपनी किस्मत आजमाने या इलाज के लिए हैदराबाद आते हैं.
मरीजों और मजदूरों का पक्का ठिकाना
इन पुरानी सरायों की सबसे बड़ी खूबी इनकी लोकेशन है. शेखपेट सराय. आज़म खानी सराय और नामपल्ली की ये इमारतें उस्मानिया और नीलोफर जैसे बड़े सरकारी अस्पतालों के बेहद करीब हैं. पड़ोसी राज्यों से अपनों का इलाज कराने आए परिवार. जो होटलों का खर्च नहीं उठा सकते. उनके लिए ये मुसाफिरखाने एक किफायती और सुरक्षित छत मुहैया कराते हैं. इसके अलावा लाड बाज़ार के चूड़ी कारीगर और दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोग भी इन बरामदों में घर जैसा अहसास पाते हैं. यहाँ आज भी मिट्टी के घड़ों का ठंडा पानी और साझी रसोई की खुशबू महसूस की जा सकती है.
जर्जर होती दीवारें और संरक्षण की चुनौती
वक्त की मार और उचित रखरखाव के अभाव में इन ऐतिहासिक विरासतों की चमक अब धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है. हालांकि प्रशासन ने इन्हें हेरिटेज घोषित कर रखा है. लेकिन कई सरायों के हिस्से अब जर्जर होकर गिरने की कगार पर हैं. मुसाफिरों की बढ़ती भीड़ और सुविधाओं की भारी कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. ये मुसाफिरखाने केवल पत्थर और चूने का ढांचा नहीं हैं. बल्कि उस दौर के गवाह हैं जब मेहमाननवाज़ी हैदराबाद की तहजीब का सबसे अहम हिस्सा हुआ करती थी. आज भी जब कोई थका-हारा मुसाफिर इन मेहराबों के नीचे सुस्ताता है. तो निज़ामी दौर की वो विरासत फिर से जी उठती है.
About the Author
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content...और पढ़ें
Location :
Hyderabad,Hyderabad,Telangana
First Published :
March 13, 2026, 11:32 IST

1 hour ago
