Reasons for the strength of Iranian Khamenei regime: पिछले छह दशकों में ईरान संकट के कई दौरों से गुज़र चुका है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद, और खासकर 1989 में अयातुल्ला अली ख़ामेनेई के सर्वोच्च नेता बनने के बाद से, ईरान में राजनीतिक तनाव की स्थिति करीब-करीब लगातार ही बनी हुई है. ईरान ने विरोध प्रदर्शनों की कई बड़ी लहरें देखी हैं—1999 और 2003 में देशव्यापी छात्र आंदोलन, 2009–10 का ग्रीन मूवमेंट, 2011–12 में अरब स्प्रिंग के बाद हुए प्रदर्शन, 2016 में साइरस द ग्रेट के मकबरे पर हुए विरोध, 2017 से 2022 के बीच आर्थिक कारणों से चला लंबा असंतोष (जिसमें नवंबर 2019 का कुख्यात “ब्लडी नवंबर” शामिल है, जब कथित तौर पर 1,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी गई), 2022–23 में महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद महिलाओं के नेतृत्व में हुए आंदोलन, और वर्तमान में जारी वे प्रदर्शन जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शिकायतों के मेल से पैदा हुए हैं.
जब-जब ऐसे विरोध भड़के, दुनिया भर के विश्लेषकों ने ईरानी शासन के पतन की भविष्यवाणी शुरू कर दी. लेकिन हर बार ये भविष्यवाणियाँ गलत साबित हुईं. हाल के दिनों में शुरू हुई अशांति के दौरान भी, कुछ दिन पहले तक अटकलें सग रही थीं कि श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल की तरह ईरान में भी प्रदर्शनकारी नेतृत्व परिवर्तन को मजबूर कर देंगे. लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक, ईरानी सत्ता ने एक बार फिर नियंत्रण हासिल कर लिया है और अपने आज़माए हुए तरीकों से आंदोलनों को तेज़ी से सीमित और निष्प्रभावी कर दिया है.
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक जवाबदेही से ज्यादा धार्मिक प्रभाव और वैचारिक निष्ठा को प्राथमिकता देती है. देश में चुनाव होते हैं, लेकिन लोकतंत्र की अवधारणा पीछे रह जाती है. बार-बार हुए राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों के बावजूद अयातुल्ला ख़ामेनेई की सत्ता पर पकड़ आश्चर्यजनक रूप से मज़बूत बनी हुई है. यह केवल एक संयोग नहीं है. दरअसल, ख़ामेनेई की सत्ता एक सावधानी से निर्मित ढाँचे पर टिकी है, जो संस्थानों, सुरक्षा बलों, विचारधारा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक नियंत्रण तक फैला हुआ है. तमाम चुनौतियों के बावजूद ईरानी शासन क्यों टिकाऊ है, यह समझने के लिए कुछ मूलभूत स्तंभों को जानना होगा जो इसे सहारा देते हैं.
1. ईरानी शासन मॉडल: केंद्रीकृत सत्ता
ईरान के राजनीतिक स्थायित्व के केंद्र में उसका शासन मॉडल है. सारी सत्ता देश के सर्वोच्च नेता में केंद्रीकृत है, जिससे जन दबाव के माध्यम से शासन में बदलाव बेहद मुश्किल हो जाता है. सर्वोच्च नेता सेना, न्यायपालिका, खुफिया एजेंसियों और मीडिया पर नजर रखता है. साथ ही निर्वाचित संस्थाओं द्वारा लिए गए निर्णयों को वीटो करने का अधिकार भी उसके पास है.
गार्जियन काउंसिल जैसी संस्थाएँ, जो चुनाव के लिए उम्मीदवारों को चुनती हैं तो सत्ता के प्रति निष्ठावान सदस्यों से भरी एक्सपर्ट्स असेंबली यह सुनिश्चित करती है कि ऐसे लोग ही सियासी पदों तक पहुंचें जिनकी निष्ठा इस्लामी गणराज्य की विचारधारा में हो. इसका नतीजा ये होता है कि चुनाव होने पर भी वे शासन की मूल संरचना को चुनौती नहीं देते. ये संरचना सर्वोच्च नेता के इर्द-गिर्द मज़बूती से खड़ी रहती है. यह प्रणाली झटकों और संकटों को सहने के लिए ही बनाई गई है. विरोध-प्रदर्शन सत्ता के लिए तात्कालिक मुसीबत बनते हैं, लेकिन वे सत्ता की अंदरूनी परतों तक शायद ही पहुंच पाते हैं.
महत्वपूर्ण यह है कि सर्वोच्च नेता देश की सुरक्षा व्यवस्था—इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), बसीज मिलिशिया और अन्य खुफिया व क़ानून-प्रवर्तन एजेंसियों—पर पूरा नियंत्रण रखता है. इससे असहमति को तेज़ी से और अक्सर क्रूर तरीकों से दबाया जा सकता है, जिसमें सामूहिक गिरफ्तारियाँ, फाँसियाँ, जबरन ग़ायब किया जाना, इंटरनेट बंद करना और नियंत्रित हिंसा शामिल हैं.
हालाँकि, ईरानियों का एक तबका इन उपायों को दमन मानता है, लेकिन सत्ता के प्रति निष्ठावान एक बड़ा तबका इन्हें राष्ट्रीय रक्षा के लिए आवश्यक कदम के रूप में देखता है. बसीज को राज्य द्वारा “वंचित और उत्पीड़ितों” के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे यह नैरेटिव मज़बूत होता है कि आंतरिक असहमति या तो विदेशों से प्रेरित है या राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए ख़तरा है.
2. वैचारिक और धार्मिक प्राधिकार: ख़ामेनेई की असली ताकत
1989 में नेतृत्व संभालने के बाद से 87 वर्षीय अयातुल्ला अली ख़ामेनेई ने कई बार आंतरिक अशांति, बाहरी सैन्य दबाव और दशकों के आर्थिक प्रतिबंधों का सामना किया है. उनका प्रभाव उस संवैधानिक ढांचे में निहित है, जिसे एक्सपर्ट्स असेंबली ने बनाया है. सत्ता की ये व्यवस्था जन समर्थन से ज्यादा धार्मिक वैधता पर आधारित है.
1939 में मशहद में जन्मे ख़ामेनेई ट्वेल्वर शिया परंपरा के मौलवी हैं, जिन्हें इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह) का प्रशिक्षण प्राप्त है. उनका अधिकार विलायत-ए-फ़क़ीह (इस्लामी न्यायविद की संरक्षकता) के सिद्धांत पर आधारित है, जो एक योग्य धर्मगुरु को राज्य और समाज का सर्वोच्च संरक्षक मानता है, शिया धर्मशास्त्र में छिपे हुए इमाम के प्रतिनिधि और सहायक के रूप में. यह सिद्धांत धर्म और राजनीति को इतनी गहराई से जोड़ देता है कि सर्वोच्च नेता का विरोध करना इस्लाम का विरोध बताकर प्रस्तुत किया जा सकता है.
हालाँकि ईरान का संविधान चुनावों की अनुमति देता है लेकिन सर्वोच्च नेता का धार्मिक वीटो यह सुनिश्चित करता है कि व्यवस्था का इस्लामी मूल सुरक्षित रहे. ख़ामेनेई ने विचारधारा का उपयोग कर जन असंतोष को राष्ट्रवादी भावना में बदलने की कला में भी महारत हासिल की है. आम लोग भले ही भ्रष्टाचार या आर्थिक कुप्रबंधन के लिए निर्वाचित सरकारों की आलोचना करें, लेकिन बाहरी ख़तरों—विशेष रूप से अमेरिका या इज़राइल जैसे पश्चिमी देशों—के समय सभी सर्वोच्च नेता के पीछे एकजुट हो जाते हैं.
धार्मिक कर्तव्य और राष्ट्रीय एकता का यह आह्वान बार-बार विरोध आंदोलनों को उस निर्णायक सीमा को पार करने से रोकता रहा है, जो शासन परिवर्तन के लिए आवश्यक होती है, भले ही राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक कमजोरियाँ उजागर क्यों न हों.
3. ईरानी “डीप स्टेट”: शासन का छिपा हुआ कवच
ख़ामेनेई की शक्ति का शायद सबसे बड़ा स्रोत वह गहराई से जमी हुई ईरानी “डीप स्टेट” है, जिसे उन्होंने पिछले तीन दशकों में विकसित किया है. यह केवल एक छाया सरकार नहीं, बल्कि सैन्य, धार्मिक, आर्थिक और खुफिया संस्थानों का गहरा नेटवर्क है, जो औपचारिक रूप से निर्वाचित संस्थाओं के साथ और कई बार उनसे ऊपर काम करता है.
इस डीप स्टेट में IRGC, बसीज नेतृत्व, क़ुद्स फ़ोर्स, खुफिया मंत्रालय, प्रभावशाली मौलवी, न्यायपालिका के हिस्से, शक्तिशाली धार्मिक फ़ाउंडेशन (बोन्याद), खतम अल-अनबिया जैसे प्रमुख ऊर्जा और निर्माण समूह, और अनेक ऐसे गैर-जवाबदेह निकाय शामिल हैं जो सीधे सर्वोच्च नेता के प्रति जवाबदेह हैं.
इसके उद्देश्य स्पष्ट हैं—इस्लामी विचारधारा का संरक्षण, शासन का अस्तित्व, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों पर नियंत्रण, विपक्ष का दमन, सत्ता हस्तांतरण का प्रबंधन, प्रतिबंधों को दरकिनार करना, क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को वित्तपोषित करना और व्यवस्था के भीतर निष्ठा को पुरस्कृत करना.
ईरान की डीप स्टेट को दूसरों से अलग करने वाली बात इसकी संस्थागत दोहराव व्यवस्था और वैचारिक एकजुटता है. सत्ता कई ओवरलैपिंग संस्थाओं में बंटी है, जिससे यदि एक घटक कमजोर भी पड़े, तो अन्य उसकी भरपाई कर देते हैं. निष्ठा केवल भौतिक लाभों से ही नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य और वैचारिक सामंजस्य से भी मज़बूत की जाती है. यही कारण है कि ईरानी डीप स्टेट दुनिया की सबसे लचीली व्यवस्थाओं में से एक है और विरोध या चुनावों के ज़रिये शासन को गिराना अत्यंत असंभव बना देती है.
4. संकट से सीख: रणनीतिक अनुकूलन और नियंत्रण
ख़ामेनेई के नेतृत्व की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि उन्होंने आंतरिक और बाहरी—दोनों तरह के संकटों से सीखने की क्षमता दिखाई है. वे एक ऐसे सैन्य नेता की तरह व्यवहार करते हैं जो कोई भी निर्णय लेने से पहले उसका पूरा विश्लेषण करता है. उनके शासन ने लीबिया, इराक, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और अन्य देशों में सरकारों के पतन का सावधानी से अध्ययन किया है. वे यह समझते हैं कि शासन के खिलाफ विपक्षी नेतृत्व को कभी भी एकजुट नहीं होने देना चाहिए.
2022 में नैतिकता पुलिस से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान, शासन ने पहले बल प्रयोग और और फिर पीछे हटने की रणनीति अपनाई। हिजाब प्रवर्तन में अस्थायी ढील और गाइडेंस पेट्रोल की निलंबन ने आंदोलन की गति को कुंद कर दिया. ऐसे ही सीमित और सोची-समझी रियायतें पहले भी बार-बार प्रयोग की गई हैं ताकि विरोधी गठबंधनों को तोड़ा जा सके.
ईरान–इराक युद्ध के दौरान हुए भारी नुकसान ने भी ईरान की रणनीतिक संस्कृति को आकार दिया. इसके बाद से तेहरान ने अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ प्रत्यक्ष पारंपरिक युद्ध से बचते हुए प्रॉक्सी संघर्षों को प्राथमिकता दी है. कूटनीतिक स्तर पर, ख़ामेनेई ने आवश्यकता पड़ने पर व्यावहारिक लचीलापन भी दिखाया है, जिसमें प्रतिबंधों से राहत के लिए 2015 के JCPOA परमाणु समझौते को मौन समर्थन देना शामिल है, भले ही पश्चिम के प्रति वैचारिक विरोध हो.
घरेलू स्तर पर, विरोधों को उभरने दिया जाता है, लेकिन उन्हें संगठित नहीं होने दिया जाता. नेतृत्वविहीन और बिखरे हुए आंदोलन को कुचलना आसान होता है, जिसके बाद धार्मिक प्रतीकों और राज्य कथाओं का उपयोग कर व्यवस्था बहाल की जाती है.
5. आर्थिक नियंत्रण: संरक्षकता के ज़रिये सत्ता
आर्थिक नियंत्रण भी शासन के टिके रहने का एक अहम स्तंभ है. इसके केंद्र में बोन्याद हैं—बड़े परोपकारी ट्रस्ट जो तेल और गैर-तेल दोनों क्षेत्रों में हावी हैं और सीधे सर्वोच्च नेता को रिपोर्ट करते हैं. ऐसे 100 से अधिक फ़ाउंडेशन हैं, जो सामूहिक रूप से ईरान की GDP का अनुमानित 40–45 प्रतिशत नियंत्रित करते हैं.
मोस्तज़फ़ान फ़ाउंडेशन, सेताद-ए-एज्राइये फ़रमान-ए-इमाम, अस्तान क़ुद्स रज़वी और बोन्याद-ए-शहीद जैसे प्रमुख बोन्याद अरबों डॉलर की संपत्तियों पर नियंत्रण रखते हैं. ये संगठन धन उत्पन्न करते हैं, जिसका उपयोग संरक्षकता नेटवर्क बनाए रखने, निष्ठावानों को पुरस्कृत करने और प्रतिद्वंद्वियों को हाशिये पर डालने के लिए किया जाता है, जबकि वे काफी हद तक अपारदर्शी और गैर-जवाबदेह बने रहते हैं.
दशकों के प्रतिबंधों, 2025 में कथित रूप से 40 प्रतिशत से अधिक महँगाई और आज की गंभीर मुद्रा अवमूल्यन के बावजूद, शासन ने काले बाज़ार में तेल बिक्री, अनौपचारिक वित्तीय नेटवर्क और वैश्विक बाज़ारों से आर्थिक अलगाव के माध्यम से खुद को बनाए रखा है. ईरान की अपेक्षाकृत बंद आर्थिक व्यवस्था राज्य को उन झटकों को सहने देती है जो अन्य खुली अर्थव्यवस्थाओं को तुरंत पंगु बना सकते हैं. यह केंद्रीकृत आर्थिक नियंत्रण सुनिश्चित करता है कि आम ईरानी भारी कठिनाइयाँ झेलें, लेकिन शासन के पास अपनी सुरक्षा व्यवस्था, डीप स्टेट और राजनीतिक कोर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त संसाधन बने रहें.
ईरान का बार-बार जन आंदोलनों के बावजूद टिके रहना न तो रहस्य है और न ही संयोग का परिणाम. यह एक जानबूझकर गढ़ी गई व्यवस्था का नतीजा है, जो धार्मिक वैधता, संस्थागत नियंत्रण, आर्थिक प्रभुत्व और दमनकारी शक्ति को एक साथ जोड़ती है. जब तक ये स्तंभ बने रहेंगे, ईरान में तात्कालिक शासन पतन की भविष्यवाणियाँ—चाहे सड़क पर अशांति कितनी भी तीव्र क्यों न हो—अकाल्पनिक ही बनी रहेंगी.

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