Iran Protests: जब अमेरिका ईरान पर हमले की फाइनल मीटिंग कर रहा है. जब इजरायल अटैक को लेकर अलर्ट मोड पर है और जब ईरान में कट्टरपंथी बनाम क्रांतिकारी की जंग बढ़ती जा रही है. तब, ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई ने बुर्का बटालियन उतार दी है. पहला प्लान है- बुर्का बटालियन यानी बुर्के वाली महिलाओं के जरिए खामेनेई के समर्थन में प्रोपेगेंडा करना और दूसरे प्लान का नाम है मोहरिब यानी इस्लामिक कानून की आड़ में बागियों का नरसंहार करना.
खामेनेई सड़कों पर उतार रहे बुर्का ब्रिगेड
पिछले 24 घंटों से ईरान में एक नया तबका खड़ा होता नजर आ रहा है. ये तबका उन कट्टरपंथियों का है जो खामेनेई विरोधियों को ललकारने के लिए रैलियां निकाल रहा है. खास बात ये है कि जिस तरह खलीफा के खिलाफ महिलाएं बुर्का उतारकर मैदान में उतरी थीं, ठीक उसी तरह खामेनेई के समर्थन वाली रैलियों में भी बुर्का पहनने वाली महिलाएं नजर आ रही हैं. इस तरह महिलाओं को सड़क पर उतारने के पीछे खामेनेई समर्थकों का सिर्फ एक ही मकसद है. दुनिया के सामने ये प्रोपेगेंडा करना कि खामेनेई शासन में महिला अधिकारों का हनन नहीं हो रहा है और ईरान की महिलाओँ का एक बड़ा तबका आज भी खलीफा की हुकूमत के साथ खड़ा है.
खलीफा यानी खामेनेई के समर्थन में निकाली जा रही इन रैलियों में चेहरे अलग-अलग नजर आते हैं लेकिन आवाज एक ही सुनाई देती है. ये नारा है दर खिदमत खामेनेई यानी खामेनेई हम तुम्हारी सेवा में हाजिर हैं. आपको भी इन कट्टरपंथी नारों की तासीर को बेहद गौर से समझना चाहिए.
अब तक कट्टरपंथियों की 13 रैलियां
ईरान में अब तक कट्टरपंथियों की ऐसी 13 रैलियां हो चुकी हैं और खामेनेई शासन का प्लान है कि देश के तकरीबन 180 शहरों में ऐसी ही बुर्का बटालियन वाली रैलियां आयोजित की जाएं.
अब हम इन रैलियों में शामिल खातूनों यानी खामेनेई का समर्थन करने वाली कथित बुर्का बटालियन का चेहरा एक्सपोज करने जा रहे हैं ताकि आपको पता चल सके कि खामेनेई से जुड़ी ये रैलियां आम महिलाओं की आवाज नहीं हैं, ये सिर्फ और सिर्फ कोरा झूठ है .
खलीफा के शासन को समर्थन देने वाली इन महिलाओं को ईरान के सिस्टम से ही चुन-चुनकर निकाला गया है. स्वतंत्र आंकलनों के अनुसार इन रैलियों में बसिज मिलिशिया से जुड़ी महिलाकर्मी शामिल हैं.
बसिज मिलिशिया ईरान की कुख्यात IRGC का पैरा मिलिट्री विंग है. ईरानी पुलिस की महिला कर्मचारियों को भी सादे कपड़ों में लाकर रैलियों का हिस्सा बना दिया गया है.
खामेनेई के लिए सड़कों पर उतरीं
इन कथित प्रदर्शनों में ईरान के उन खानदानों की महिलाएं भी शामिल हैं जिनके ऊपर खामेनेई का वरद हस्त है लेकिन सबसे ज्यादा तादाद उन महिला छात्रों की है जो ईरान के मदरसों में पढ़ती हैं. यानी ये ईरान की आम महिलाएं नहीं हैं बल्कि खलीफा की वो बुर्का बटालियन है जो मानवीय विचारों को कुचलकर...खामेनेई के कट्टरपंथी शासन को बचाने के लिए सड़क पर उतरी हैं.
आज खामेनेई की ये बुर्का बटालियन अपने खलीफा के कट्टरपंथी शासन को बचाने के लिए सड़कों पर उतरी हैं लेकिन इनका अपना एक बदनाम इतिहास भी है. खामेनेई के सिस्टम ने किस तरह कट्टरपंथी महिलाओं यानी बुर्का बटालियन का इस्तेमाल किया है.
ईरान की इस्लामिक पुलिस ने वर्ष 2005 में एक अभियान शुरू किया था. इस अभियान का नाम था गश्त-ए-इरशद यानी गश्त के जरिए कथित नैतिकता का पालन कराना. इस अभियान के लिए कट्टरपंथी महिलाओं को भर्ती किया गया था. ये महिलाएं बुर्का पहनकर ऐसी लड़कियों की धरपकड़ करती थीं जो हिजाब या बुर्का नहीं पहनती थीं. कुछ मामलों में तो इस बुर्का बटालियन ने इस्लामिक पोशाक का उल्लंघन करने वाली लड़कियों को टॉर्चर करके मार भी दिया था.
खामेनेई राज खत्म हुआ तो भुगतना होगा अंजाम
इस बुर्का बटालियन को भी पता है अगर खामेनेई का शासन खत्म हुआ तो इन्हें भी अपने गुनाहों का हिसाब देना होगा. इसी वजह से ये बुर्का बटालियन तेहरान से लेकर ईरान के अलग-अलग शहरों में सड़कों पर निकली है ताकि खलीफा का शासन बचा रहे और इन्हें सलाखों के पीछे जिंदगी ना बितानी पड़े.
बुर्का बटालियन को मैदान में उतारने के साथ ईरान के क्रांतिकारियों की आवाज दबाने के लिए अब झूठा प्रोपेगेंडा भी किया जा रहा है. अब आपको ईरानी सिस्टम के खोखले प्रोपेगेंडा का एक बड़ा सबूत बताते हैं.
सरकारी मीडिया की क्लिप वायरल
इंटरनेट पर ईरान के सरकारी मीडिया की एक वीडियो क्लिप वायरल हो रही है. इस क्लिप में आपको एक रिपोर्टर हेलीकॉप्टर में बैठा नजर आ रहा है. ये रिपोर्टर नीचे की तरफ देखता है और बताता है कि हजारों लोग खामेनेई के समर्थन में उतरे हुए हैं लेकिन आप इस वीडियो को गौर से देखेंगे तो आपको कुछ हैरान करने वाली बातें नजर आएंगी. हेलीकॉप्टर के किनारे पर बैठे रिपोर्टर ने बेल्ट नहीं पहन रखी है. ऐसा लगता है मानो उसे नीचे गिरने का डर नहीं है.
हेलीकॉप्टर के पंखों के घूमने से बहुत तेज आवाज होती है. उस आवाज से कानों को बचाने के लिए हेडफोन जैसा यंत्र पहना जाता है लेकिन ईरान की प्रोपेगेंडा मीडिया के इस रिपोर्टर ने हेडफोन तक नहीं पहन रखा है. यानी ये एक डॉक्टर्ड क्लिप है जो क्रोमा पर बनाई गई है और इसे टीवी से लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया है.
इसी किस्म के हथकंडों को लेकर रूस के मशहूर लेखक और कम्युनिस्ट शासन के विरोधी एलेक्जेंडर सोलजेनसिन ने अपने निबंध LIVE NOT BY LIES में लिखा था.किसी भी आतातायी शासन की बुनियाद हिंसक कार्रवाई से पड़ती है लेकिन जब ऐसा शासन कब्र की तरफ जाता है तो वो सबसे पहले झूठ बोलना शुरू करता है. कुछ ऐसे ही झूठ अब ईरान में भी परोसे जा रहे हैं.
मौलानाओं को भी खामेनेई ने किया एक्टिव
एक तरफ प्रोपेगेंडा के लिए खामेनेई की बुर्का बटालियन यानी कट्टरपंथी महिलाओं के समूह को सड़कों पर उतारा गया है तो दूसरी तरफ बागियों यानी क्रांतिकारियों के हौसले तोड़ने के लिए खामेनेई ने मौलानाओं को एक्टिव कर दिया है. खामेनेई खेमे के धर्मगुरुओं ने बागियों को बदनाम करने के लिए जो फॉर्मूला अपनाया है..उसे नाम दिया गया है मोहरिब.अब हम आपको इसी मोहरिब के बारे में बताने जा रहे हैं.
मोहरिब फारसी भाषा का शब्द है. इसका शाब्दिक अर्थ है वो शख्स जो ऊपरवाले यानी अल्लाह के खिलाफ जंग करता है. इस्लामिक शरिया में भी इस मोहरिब का जिक्र है लेकिन ईरान में मोहरिब को खामेनेई की कुर्सी को बचाए रखने वाला कवच बना लिया गया है. ईरान के पीनल कोड का आर्टिकल 279 कहता है कि जो शख्स सरकार के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह करेगा उसे भी मोहरिब कहा जाएगा और ईरान के कानून में मोहरिब के लिए दो सजाओं का प्रावधान. पहली सजा है फांसी और दूसरी सजा है हाथ और पांव काट देना.
खामेनेई की बेरहमी का सबूत है मोहरिब
शरिया का नाम लेकर जिस मोहरिब को ईरान में एक बार फिर एक्टिवेट किया गया है. उसे कानून कहना गलत होगा. ये मोहरिब दरअसल खामेनेई शासन की बेरहमी का सबसे बड़ा सबूत है. मोहरिब की इस इस्लामिक प्रथा को वर्ष 2013 में ईरानी पीनल कोड यानी कानून का हिस्सा बनाया गया था लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ तभी किया गया है जब खामेनेई के खिलाफ बगावत हुई है. अब आको ईरान में इसी मोहरिब की हिस्ट्रीशीट दिखाने जा रहे हैं.
सबसे पहले मोहरिब को वर्ष 2022 में शासन का हथियार बनाया गया था. उस वक्त ईरान में हिजाब को लेकर महिलाओं के प्रदर्शन हो रहे थे. मोहरिब के तहत 520 महिला एक्टिविस्ट को मौत की सजा सुनाई गई थी. फिर वर्ष 2023 में हुए छात्र आंदोलन के दौरान 853 छात्रों को मोहरिब करार देकर मौत के घाट उतार दिया गया था. इसी तरह वर्ष 2025 में सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के जुर्म में 2200 लोगों को मोहरिब करार देकर मार दिया गया था. वर्तमान प्रदर्शनों के दौरान भी आंदोलनकारियों पर ईरान की कट्टरपंथी पुलिस ने मोहरिब होने का आरोप लगाया है.
मोहरिब ने आधी आबादी को हाशिए पर धकेला
कट्टरपंथी सोच और शरिया को आड़ बनाकर तैयार किए गए मोहरिब जैसे कानूनों को लेकर ही ईरान की नोबेल पीस प्राइज विजेता शिरिन एबदी ने कहा था कि ईरान में आधी आबादी को हाशिए पर धकेल दिया गया है. आज जरूरत है कि इस्लाम के सच्चे मूल्यों को ईरान में लागू किया जाए ताकि ईरान का कट्टरपंथी शासन इस्लामी कानूनों का गलत इस्तेमाल ना कर पाए. ईरान की कथित इस्लामिक क्रांति को 47 साल पूरे हो चुके हैं. खामेनेई का खेमा इसे इस्लामिक ईरान के इतिहास का अहम पड़ाव करार दे रहा है लेकिन ईरान के इतिहास में इसी नंबर यानी 47 का अपना एक महत्व भी है. ईरान में 47 नंबर को किस तरह देखा जाता है । ये आपको भी ध्यान से समझना चाहिए.
ईरान की सामाजिक परंपराओं में 47 नंबर को माग यानी जादू से जोड़ा जाता है. मिथकों के मुताबिक जब समाज में बड़े बदलाव का बीज बोया जाता है तो माग यानी जादू पैदा होता है. इन मिथकों को मानने वाले भी उम्मीद कर रहे हैं कि इस्लामिक शासन के 47 साल पूरे होने पर शायद नंबर 47 से जुड़ा कोई जादू सामने आए और ईरान से कट्टरपंथी शासन का THE END हो जाए.

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