संक्रमित मच्छरों से कटवाया, खतरनाक प्रयोग कर इंसानियत को आपदा से बचाने के लिए दे दी जान

1 hour ago

25 सितंबर 1900 को, डॉ. जेसी विलियम लेज़ियर की क्यूबा में पीत ज्वर से मौत हो गई. वह 34 साल के थे. वे अपने पीछे मैरीलैंड में अपनी पत्नी, एक साल का बेटा और एक नई जन्मी बेटी छोड़ गए, जो उनसे कभी नहीं मिल पाएगी. लेज़ियर कोई बेपरवाह रोमांच पसंद करने वाला या कोई छोटा-मोटा एक्सपेरिमेंट करने वाले शख्स नहीं थे. वह एक ट्रेंड डॉक्टर और एपिडेमियोलॉजिस्ट थे, जिन्होंने जॉन्स हॉपकिन्स से पढ़ाई की थी और उन्नीसवीं सदी की सबसे जानलेवा बीमारियों में से एक की रिसर्च कर रहे थे. उनकी मौत को लेकर सबसे खास बात ये थी कि उन्होंने पीत ज्वर वाले संक्रमित मच्छर से कटवाकर खुद पर ये जानलेवा प्रयोग किया था. उनके इस प्रयोग के बाद ही ये साबित हो सक कि पीत ज्वर नाम की जानलेवा बीमारी मच्छरों से ही फैलती है. 

यह एक ऐसी कामयाबी थी जिसने पब्लिक हेल्थ को बदल दिया और पनामा कैनाल जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स को मुमकिन बनाया. सदियों तक पोर्ट शहरों में ये बीमारी फैलती रही लेकिन 1898 के स्पैनिश-अमेरिकन युद्ध ने यूनाइटेड स्टेट्स को पीत ज्वर का सामना एक स्ट्रेटेजिक खतरे के तौर पर करने पर मजबूर किया. क्यूबा में, स्पैनिश गोलियों से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक पीत ज्वर और मलेरिया से मरे. अमेरिकन आर्मी को इस बात का जवाब चाहिए था.

पीत ज्वर कमीशन और एक खारिज की गई थ्योरी

जून 1900 में, US आर्मी के सर्जन जनरल ने क्यूबा में एक टीम भेजी. मेजर वाल्टर रीड, मेजर जेम्स कैरोल, एरिस्टाइड्स एग्रामोंटे और जेसी लेज़ियर ने मिलकर पीत ज्वर कमीशन बनाया. सबसे पहले, उन्होंने मुख्य बैक्टीरियोलॉजिकल थ्योरी को आगे बढ़ाया. कई लोगों का मानना ​​था कि पीत ज्वर बैसिलस इक्टेरोइड्स नाम के बैक्टीरिया की वजह से होता है, जिसे इटैलियन रिसर्चर ग्यूसेप सनारेल्ली ने बताया था. कमीशन ने जांच की और यह नतीजा निकाला कि बैक्टीरिया एक कंटैमिनेंट था, वजह नहीं.

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इसके बाद साल 1881 में, क्यूबा के डॉक्टर डॉ. कार्लोस फिनले ने कहा था कि पीत ज्वर सीधे इंसानी संपर्क या गंदे बिस्तर से नहीं, बल्कि मच्छरों से फैलता है, खासकर एडीज़ जीन्स के. जब फिनले ने 1881 के इंटरनेशनल सैनिटरी कॉन्फ्रेंस में अपनी हाइपोथिसिस पेश की, तो उसे खारिज कर दिया गय. यह आइडिया अंदाज़ा लगाने वाला और बिना सबूत वाला लग रहा था. लेकिन 1900 तक, साइंटिफिक सोच बदल गई थी. ब्रिटिश और इटैलियन रिसर्चर्स ने दिखाया था कि एनोफिलीज़ मच्छर मलेरिया फैलाते हैं. वेक्टर से होने वाली बीमारी अब बेतुकी नहीं थी. यह मुमकिन थी. लेज़ियर को लगता था कि फिनले सही हो सकते हैं. 8 सितंबर 1900 को, उन्होंने अपनी पत्नी को लिखा, 'मुझे लगता है कि मैं असली जर्म के निशाने पर हूं.'

मच्छर ही पीत ज्वर के वाहक थे

डॉ. जेसी विलियम लेज़ियर ने एडीज़ मच्छरों को ब्रीड करना शुरू कर दिया था, जिस जीन्स की पहचान फिनले ने की थी. इस प्रयोग से एक बात तो पता चल गई कि मच्छर तुरंत बीमारी नहीं फैला सकता था. इसे इंफेक्शन फैलाने से पहले कई दिनों तक अंदर ही इंफेक्शन को इनक्यूबेट करना पड़ा, जिसे रिसर्चर्स ने 'एक्सट्रिंसिक इनक्यूबेशन पीरियड' कहा. 

शुरुआती कोशिशों के बाद  वॉलंटियर्स को इंफेक्ट करने की शुरुआती कोशिशें फेल हो गईं क्योंकि उन्होंने काफी इंतज़ार नहीं किया था. जब उन्होंने उस टाइमिंग को ठीक किया तो नतीजे और बेहतर हुए. जेम्स कैरोल ने खुद को एक ऐसे मच्छर से कटने दिया जिसने पीत ज्वर के एक मरीज़ को काटा था और उसका इनक्यूबेशन पीरियड पूरा हो गया था. कुछ ही दिनों में, वह बहुत बीमार पड़ गये वह बहुत मुश्किल से बच तो गए लेकिन इत्तेफाक को खारिज करने के लिए, एक जवान सैनिक जिसे पहले पीत ज्वर नहीं हुआ था, उसे भी कंट्रोल्ड कंडीशन में इसी मच्छर से कटवाया गया उसे भी यह बीमारी हो गई और वह भी ठीक हो गये.

13 सितंबर 1900 को किया खतरनाक प्रयोग

13 सितंबर, 1900 को या उसके आस-पास लेज़ियर एक ऐसे मच्छर के संपर्क में आए जिसने सही इनक्यूबेशन इंटरवल के बाद पीत ज्वर के एक मरीज़ को काटा था. क्या यह संपर्क पूरी तरह से जानबूझकर किया गया था? इस पर अभी भी बहस होती है. ऑफिशियल अकाउंट में कहा गया कि एक्सपेरिमेंटल कीड़ों को संभालते समय उन्हें गलती से इंफेक्शन हो गया था. हालांकि, बाद में वाल्टर रीड ने दावा किया कि उन्हें लेज़ियर की नोटबुक में ऐसे रेफरेंस मिले हैं जिससे पता चलता है कि उन्होंने जानबूझकर खुद पर एक्सपेरिमेंट किया था. 

महज 34 वर्ष की उम्र में गंवाईं जान

वह नोटबुक रीड के पूरे करियर में उनके पास रही और कहा जाता है कि रीड की मौत के कुछ समय बाद गायब हो गई, जिससे यह सवाल अनसुलझा रह गया. जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि इसके बाद क्या हुआ. कुछ ही दिनों में, लेज़ियर में पीत ज्वर जैसे लक्षण दिखने लगे. बुखार, बेचैनी और हालत लगातार बिगड़ती गई. 25 सितंबर, 1900 को क्यूबा में 34 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई.

ऐसे दी पीत ज्वर को शिकस्त

टीम के काम से उन्हें बड़े पैमाने पर साइंटिफिक और पब्लिक तारीफ़ मिली. वे 'पीत ज्वर' को जीतने वाले के नाम से जाने गए. वाल्टर रीड की कब्र पर बाद में ये लिखा गया, 'उन्होंने इंसान को उस भयानक मुसीबत, पीत ज्वर पर कंट्रोल दिया.' उनके योगदान को आर्मी रजिस्टर में भी पहचान मिली, जहां हिस्सा लेने वालों को हर साल रोल ऑफ़ ऑनर में लिस्ट किया जाता था. मिलिट्री के अलावा, एक्सपेरिमेंट में शामिल 22 सदस्यों को U.S. कांग्रेस और प्रेसिडेंट से फॉर्मल पहचान मिली, जिसमें ज़िंदा सदस्यों और मरने वालों की विधवाओं को गोल्ड मेडल दिए गए.

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