क्यों हो रहा महिलाओं का खतना? सुप्रीम कोर्ट ने कानून मंत्रालय से मांगा जवाब

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Last Updated:November 29, 2025, 07:23 IST

Supreme Court on Mahila Khatna: सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना पर प्रतिबंध की याचिका पर केंद्र और कानून मंत्रालय से जवाब मांगा है. याचिका में कहा गया कि यह प्रथा बच्चों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. WHO और संयुक्त राष्ट्र भी इसके खिलाफ हैं.

क्यों हो रहा महिलाओं का खतना? सुप्रीम कोर्ट ने कानून मंत्रालय से मांगा जवाबदाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना पर प्रतिबंध की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा. (प्रतीकात्मक- News18)

सुप्रीम कोर्ट कुछ मुस्लिमों, खासकर दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना पर (Female Genital Mutilation- FGM) प्रतिबंध लगाने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ-साथ कानून और न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह याचिका एनजीओ चेतना वेलफेयर सोसायटी की ओर से दायर की गई थी.

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला बच्चों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है और इसलिए इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशि किरण और अधिवक्ता साधना संधू ने दलील दी कि महिला खतना न तो इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है और न ही किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका स्पष्ट उल्लेख है. इसके बावजूद बच्चियों पर मजबूरन यह प्रक्रिया लागू की जाती है, जिससे उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान झेलना पड़ता है.

महिलाओं पर खतने का बहुत बुरा प्रभाव

याचिका में यह भी कहा गया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां और वैश्विक मानवाधिकार संगठन लगातार देशों से महिला खतना को रोकने, अपराध घोषित करने और समाप्त करने की अपील करते रहे हैं. मेडिकल शोध बताते हैं कि इस अत्याचार के चलते पीड़िताओं को अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के शारीरिक और मानसिक दुष्प्रभाव झेलने पड़ते हैं.

याचिकाकर्ता ने यह भी जिक्र किया कि भारत में महिला खतना पर रोक लगाने के लिए कोई स्वतंत्र कानून मौजूद नहीं है. हालांकि भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 113, 118(1), 118(2), और 118(3) इस तरह की शारीरिक क्षति को अपराध मानती हैं. इसके अलावा पॉक्सो एक्ट के अनुसार भी किसी नाबालिग की जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना या उसमें हस्तक्षेप करना अपराध है.

याचिका में कहा गया है कि डब्लूएचओ ने एफजीएम को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया है. एफजीएम से संक्रमण, प्रसव संबंधी जटिलताएं, दीर्घकालिक दर्द, और कई गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा होते हैं. दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एकमत से एफजीएम समाप्त करने का प्रस्ताव भी पारित किया था.

दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित है महिला खतना

एनजीओ ने दावा किया है कि दाऊदी बोहरा समुदाय की लगभग 75% महिलाएं अपनी बेटियों पर यह अमानवीय प्रथा लागू करवाती हैं. याचिका में कोर्ट से गुहार लगाई गई कि वह तत्काल हस्तक्षेप कर इस परंपरा को समाप्त करने का निर्देश दे. याचिका में यह भी बताया गया कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कई अफ्रीकी देशों में एफजीएम पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन भारत में आज भी इस पर रोक लगाने वाला कोई विशिष्ट कानून नहीं है.

दाऊदी बोहरा समुदाय शिया इस्लाम का एक संप्रदाय है, और भारत में यह समुदाय एफजीएम को ‘खतना’ नाम से प्रचलित रूप में अपनाता है. याचिका के अनुसार कुरान में इस प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन समुदाय के विशेष ग्रंथ दैम-उल-इस्लाम में इसका समर्थन किया गया है. दुनिया भर के कई इस्लामी विद्वान इसे धार्मिक प्रथा नहीं मानते.

अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने के बाद यह मामला महत्व के साथ आगे बढ़ेगा. देखने वाली बात होगी कि केंद्र सरकार इस संवेदनशील और लंबे समय से विवादित मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है.

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Saad Omar

An accomplished digital Journalist with more than 13 years of experience in Journalism. Done Post Graduate in Journalism from Indian Institute of Mass Comunication, Delhi. After Working with PTI, NDTV and Aaj T...और पढ़ें

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First Published :

November 29, 2025, 07:23 IST

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